कोटा। कोचिंग के कारण शहर में पोहे की खपत तो बढ़ गई, लेकिन स्थानीय पोहा मिलों की फिर भी हालत नहीं सुधर पाई। उन्हें मिलें चलाने के लिए धान आई आर-8 और क्रांति गुजरात और मध्यप्रदेश से मंगाना पड़ता है। जिसकी लागत वहां से आने वाले पोहे से ज्यादा पड़ती है। शहर में चल रही मिलों की संख्या पिछले 15 साल में 32 से घटकर केवल 6 ही रह गई।
पोहा मिल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष हरीश दीपचंदानी ने बताया कि शहर में 150 क्विंटल पोहे की रोजाना की खपत है। जिसमें से 90 प्रतिशत सप्लाई दूसरे राज्यों से होती हैं। शहर की मिलें 10 प्रतिशत ही सप्लाई दे पाती हैं। क्योंकि गुजरात से धान मंगाकर पोहा बनाने में 125 रु./क्विंटल भाड़ा लग जाता है।
बाहर की मिलों से बनकर आए पोहे के मुकाबले यहां की मिलों को 4 रुपए किलो की लागत ज्यादा पड़ रही है। इसलिए बाहर की मिलों से प्रतिस्पर्धा में उनके लिए टिके रहना मुश्किल हो रहा है। शहर में कोचिंग संस्थानों की संख्या बढ़ने के साथ ही पोहे की मांग तो बढ़ी है। परन्तु मिलें नहीं बढ़ी। उनकी आपूर्ति दूसरे राज्यों से होने लगी हैं।
15 साल पहले इतनी तादाद में पोहा मिलें थी, कि यहां से दूसरे राज्यों में भी सप्लाई होता था, उस समय यहां पोहे की खपत कम थी। वर्तमान में पोहा मिलें चलाने के लिए सरकार की ओर से इन विशेष किस्म का धान पैदा करने के लिए प्रोत्साहन मिले तो यहां की मिलें भी अच्छी चल सकती हैं। धान की पैदावार यहां पर होगी तो लागत कम आएगी और पोहा मिलें प्रतिस्पर्धा में खड़ी रह पाएंगी।
पॉल्युशनकंट्रोल डिपार्टमेंट बाधक:
दीपचंदानी ने बताया कि पॉल्युशन कंट्रोल डिपार्टमेंट यह जाने कि कहां पॉल्युशन है और कहां नहीं। वह तो सभी उद्योगों को एक साथ नोटिस थमा देता है। जिससे कई बार चलते उद्योग बंद होने के कगार पर पहुंच जाते हैं।