कोटा। एक तरफ तो नगर निगम हर काम में पैसे न होने की बात कहकर टाल देता है और दूसरी तरफ यूआईटी पर बकाया अपनी ही राशि वसूल नहीं कर पा रहा है। पिछले 4 साल से नगर निगम की ओर से यूआईटी को बकाया राशि के लिए पत्र लिखे जा रहे हैं। यूआईटी ने राशि देना तो दूर पत्रों का जवाब देना तक बंद कर दिया। यह राशि बढ़ते-बढ़ते 50 करोड़ रुपए से अधिक पहुंच चुकी है।
निगम की जमीनें जब यूआईटी को सौंपी गई थीं तब स्वायत्त शासन विभाग ने यूआईटी को एक निश्चित राशि नगर निगम को देने की बात कही थी। ये राशि यूआईटी द्वारा बेची जाने वाली हर जमीन का 15 प्रतिशत थी। शुरुआत में तो यूआईटी ने 15 करोड़ रुपए की राशि निगम को देने की मंशा जाहिर की थी। तब भी ये राशि नगद देने की बजाय निगम के वार्डों में 25-25 लाख रुपए के विकास कार्य करवाकर चुकाई गई थी। उसके बाद से न तो यूआईटी ने राशि दी न ही कोई विकास कार्य करवाए।
'व्यक्तिगत तौर पर भी मैं यूआईटी के अधिकारियों से पिछले दिनों मिला था। हर बार वे हर बार वे भी आर्थिक संकट की बात कहकर बाद में राशि देने की बात कह देते हैं। यदि राशि मिल जाए तो निगम के कई काम पूरे हो सकते हैं। हमारे ऊपर भी कई दायित्व है, ठेकेदारों का भुगतान करना है।' - फूलसिंह मीणा, मुख्य लेखाधिकारी नगर निगम
'निगम को जो राशि देनी है उसके बदले में यूआईटी वार्डों में काम करवा देती है। नगद राशि देने की आर्थिक स्थिति यूआईटी की भी नहीं है। अभी हम काम करवा रहे हैं। बाद में जब स्थिति होगी तो शेष राशि उन्हें दे देंगे।' - मोहनलाल यादव, यूआईटी सचिव
1 किलो की हो गई फाइल
लेखा शाखा के अनुसार उन्होंने तकाजा करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। पिछले 4 साल से पत्र ही लिखे जा रहे हैं और एक साल से तो हर 15 दिन में पत्र लिख रहे हैं। हालत ये हैं कि पत्र लिखते-लिखते फाइल का वजन ही 1 किलो से अधिक हो गया।