कोटा। कोटा संभाग में सरसों की फसल जड़ों में जमीनी फफूंद (स्क्लेरोशियम रोलफ्सी) लगने से सूखकर नष्ट हो रही है। इसका खुलासा राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान केन्द्र, भरतपुर की रिपोर्ट में हुआ है। वैज्ञानिकों का दावा है कि सरसों की खेती में इस तरह की बीमारी प्रदेश में पहली बार चिह्नित की गई है। यह फफूंद सरसों की जड़ों को गला देती है, जिसके कारण कुछ समय बाद पौधा सूखकर मर जाता है।
इटावा पंचायत समिति स्थित तलाव गांव के किसान गोविंद नागर की फसल सूखने पर इस बीमारी का सबसे पहले पता 13 नवंबर को चला। नागर द्वारा बताए गए लक्षणों पर विश्वास नहीं होने पर नांता कृषि फार्म के वैज्ञानिक 14 नवंबर को मौके पर गए। वो खुद आश्चर्य में पड़ गए, क्योंकि इसके पहले ऐसी बीमारी का पता उन्हें भी नहीं था। वैज्ञानिकों ने समस्या को उम्मेदगंज कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के सामने रखा। स्थानीय वैज्ञानिक को पता नहीं होने पर इस नई बीमारी को चिह्नित करके बीमारी ग्रस्त सरसों का सैंपल राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान केन्द्र, भरतपुर भेजा गया। जहां संस्थान के पादप रोग वैज्ञानिक की परीक्षण रिपोर्ट के बाद बीमारी को चिह्नित किया गया।
वैज्ञानिकों ने परीक्षण के बाद यह दिए सुझाव
- खेत की जुताई मई में करके धूप में तपने दें और यूरिया की मात्रा अधिक न डालें।
- 100 किलो गोबर की खाद में 2.5 किलो ट्राइकोडर्मा पाउडर मिलाकर एक हैक्टेयर खेत में बुवाई पूर्व मिलाएं।
- बीज में 8 ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर प्रति किलो बीज की दर से मिलाएं।
- कार्बेंडाजिम दवा का 0.2 का घोल बनाकर रोग की प्रारंभिक अवस्था में ही छिड़काव करें।
- कभी-कभी इस बीमारी के साथ में बैक्टीरिया भी संक्रमण करता है, इसलिए 15 लीटर की पानी की टंकी में 3 ग्राम स्टेप्टोसाइक्लीन व 30 ग्राम कार्बेंडाजिम मिलाकर छिड़काव करें व 10 दिन बाद एक छिड़काव और करें।
ऐसे हुई सरसों की बीमारी की पुष्टि
कृषि उपनिदेशक डॉ. प्रकाश गुप्ता ने बताया कि नांता कृषि अनुसंधान केन्द्र पर हाल ही में "एग्रो रैपिड रेस्पोंड सिस्टम’ शुरू किया था। जिसमें परियोजना निदेशक एचएस मीणा के नेतृत्व में किसानों की नई समस्याओं का तुरंत समाधान किया जाता है। समस्या अाने पर 24 घटों में वैज्ञानिकों की दो टीमें वहां गई। 4 बार खेत का निरीक्षण किया गया। मिट्टी, सरसों, जलवायु जैसी 6 तरह की जांच की गई, जिससे नई बीमारी की पुष्टि हुई।