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दानदाताअों के चंदे के सहारे सरकारी अस्पताल में हो रही कफन की व्यवस्था

5 वर्ष पहले
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कोटा| अस्पतालमें मृत्यु के बाद अस्पताल प्रशासन कफन तक नहीं दे पा रहा है। इसके लिए दानदाताओं के चंदे का ही आसरा है। शव के सम्मान के लिए केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने अस्पताल द्वारा ही कफन देने की व्यवस्था शुरू की थी। इसके तहत अस्पताल द्वारा प्रत्येक शव पर ढाई मीटर सफेद कपड़ा मुहैया करवाया जाएगा। इस व्यवस्था की कोटा में कोई पालना नहीं हो रही है। मेडिकल कॉलेज स्वास्थ्य विभाग निशुल्क कफन की व्यवस्था तक नहीं कर पा रहा है। यही नहीं पोस्टमार्टम के मामलों में जांच के लिए विसरा भेजने के जार तक परिजनों ने मंगवाए जा रहे हैं। इन्हें खरीदने के लिए परिजनों को ढाई किलोमीटर दूर खाई रोड स्थित दुकान तक जाना पड़ता है। इसके बदले उन्हें 200 से 400 रुपए खर्च करने पड़ते हैं।

दानदाताओंसे कहकर व्यवस्था करती है पुलिस

एमबीएसमें कफन देने की व्यवस्था 3 दानदाताओं के सहारे चल रही है। शव की बेकदरी हो इसलिए एमबीएस अस्पताल में स्थित पुलिस चौकी पर तैनात पुलिसकर्मी दानदाताओं से कहकर किसी तरफ कफन मंगवा रहे हैं। चौकी के स्टाफ के अनुसार हर माह करीब 200 कफन शहर के तीन दानदाताओं द्वारा यहां रखे जाते हैं। खत्म हो जाते हैं तो फिर दानदाताओं को सूचना देते हैं। इस बीच शव आते हैं तो कफन परिजनों को ही लाना पड़ता है। हमारी कोशिश यही रहती है कि कोई भी शव बिना कफन के स्ट्रेचर पर रहे।

^कभी डिपार्टमेंट से इस तरह की डिमांड आई नहीं। यदि इस तरह की समस्या है तो कफन और जार भी खरीदने की व्यवस्था कर देंगे। कल ही डिपार्टमेंट के डॉक्टर्स को बुलाकर उनसे डिमांड का पता कर लेते हैं। -डॉ. विजय सरदाना अधीक्षक एमबीएस

^अभीतक तो शव के लिए कफन की अलग से कोई व्यवस्था नहीं है। परिजन बाजार से आते हैं। यदि परिजन के पास कफन नहीं होता है तो जिस वार्ड में मरीज की मृत्यु होती है तो वार्ड का स्टाफ कफन के रूप में चद्दर दे देता है। -डॉ. सीएस सुशील, अधीक्षक एनएमसीएच

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