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बिना अंडरपास के लिए बनाया हाइवे, वन्यजीव खतरे में

5 वर्ष पहले
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कोटा. कोटा से देवली के बीच बने फोरलेन में एनएचएआई (भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण) ने बड़ी खामी छोड़ दी। ऐसी तकनीकी खामी, जो वन्यजीवों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। विकास कार्य में बात-बात पर रोड़ा अटकाने वाले वन विभाग ने भी इस खामी पर कभी ध्यान नहीं दिया। बस चिट्ठियां लिखीं और निर्माण को देखते रहे।
असल में इस फोरलेन में बूंदी से आगे हिंडोली के पहले तक 5 किमी ऐसा वन क्षेत्र है, जो प्रस्तावित बायोस्फियर रिजर्व में आता है। वन विभाग, एनएचएआई व संवेदक फर्म ने 3 फरवरी, 2012 को एक बैठक कर इस क्षेत्र में 5 जगह अंडरपास व एक जगह एक किमी लंबी सुरक्षा दीवार बनाने पर सहमति जताई थी, लेकिन अब हाइवे चालू हो चुका है, लेकिन न अंडरपास बने, न ही सुरक्षा दीवार। अब सवाल यह कि गंभीर लापरवाही रहने के बावजूद अधिकारियों ने आखिर ठोस कदम क्यों नहीं उठाए?
चार साल से कागजों में बन रहे अंडरपास
चार साल पहले हुई साझा बैठक में तय हुआ था कि कोटा डूंगरी ब्लॉक (बूंदी जेल के सामने वाला जंगल) पर अंडरपास फिजिबल नहीं है, ऐसे में यहां एक किमी लंबी 6 फीट ऊंची सुरक्षा दीवार बनाई जाए। इसके अलावा बूंदी टनल से सथूर के बीच अलग-अलग स्थानों पर भी 5 अंडरपास बनाने थे। यह जगह एनएचएआई के बजाय पीडब्ल्यूडी के अधीन होने से डिजाइन बनाकर उन्हें पेश करनी थी। इनमें से कहीं भी अंडरपास नहीं बन पाए और न ही सुरक्षा दीवार बनी।
नेशनल पार्क अल्बर्टा कनाडा से गुजरने वाले हाइवे का नजारा
यहां 1970 तक वाहनों की टक्कर से इतनी मौतें होती थीं कि लोगों ने इस हाइवे को मीट मेकर का नाम दे दिया था। इसके बाद सरकार ने 1990 से 2013 तक कैनमोन और लेक लुइस तक के 50 मील तक दूरी में जानवरों के लिए 60 क्रासिंग स्ट्रक्चर बना दिए। इस पर पेड़ पौधे भी लगा दिए। 17 सालों में 1 लाख 60 हजार जानवर इसका उपयोग कर चुके हैं। इसके बाद बड़े जानवरों की मौत 80 फीसदी कमी आई है।
ऊपर से नीचे तक अफसरों ने लिखी 50 से ज्यादा चिट्ठियां
भास्कर के पास इस प्रकरण से जुड़ी पूरी पत्रावली मौजूद है। वन्यजीव प्रेमी तपेश्वर सिंह भाटी ने आरटीआई के तहत यह पत्रावली ली है। फाइल से पता चलता है कि फरवरी, 2012 से लेकर अब तक वन विभाग और एनएचएआई के बीच लगातार पत्र व्यवहार चल रहा है। वन विभाग के रेंजर, एसीएफ, डीसीएफ , सीएफ व सीसीएफ तथा इससे ऊपर के अधिकारी एनएचएआई के पीडी को 50 से ज्यादा पत्र लिख चुके हैं। हर पत्र में 3 फरवरी, 2012 की उसी बैठक का हवाला दिया जाता है, जिसमें अंडरपास व सुरक्षा दीवार बनाना तय हुआ था, लेकिन हुआ कुछ नहीं।
नीदरलैंड्स ने सबसे पहले बनाए थे अंडरपास
नीदरलैंड्स उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जहां हाइवे पर जानवरों के लिए सबसे पहले अंडरपास बनाए गए थे। ये फोटो नीदरलैंड्स के हाइवे ए 50 का है। नीदरलैंड में वन्यजीवों के लिए इस तरह के 600 क्रासिंग हैं। नेचर बर्ग जेनेडेरी क्राडिलो नामक यह नेचर ब्रिज तो 800 मीटर लंबा और 50 मीटर चौड़ा है। यह ब्रिज 2006 में बना था। यह फोटो नीदरलैंड्स के बटर टीमाई नेचर रिजर्व का है।
कहीं वैसा न हो जाए...
असल में इसी तरह की खामी एनएच-76 (डाबी रोड) में रही थी। इस मार्ग पर जवाहर सागर सेंचुरी का जंगल पड़ता है, फोरलेन शुरू होने के बाद से अब तक 5 भालू, 3 लोमड़ी, 1 चिंकारा व दर्जनभर से ज्यादा नीलगायों की सड़क दुर्घटना में मौतें हुई है। कोटा से डाबी के बीच ही इस फोरलेन पर 22 अगस्त, 2009, 15 अगस्त, 2010, 27 अक्टूबर, 2012 को खड़ीपुर के पास और 17 जून तथा 24 जून 2011 को करोंदी के पास सड़क दुर्घटना में 5 भालुओं की मौत हो चुकी है। मामला सुर्खियों में आया तो बाद में जवाहर सागर सेंचुरी एरिया में सुरक्षा दीवार बनाई गई।
बूंदी डीसीएफ दिग्विजय गुप्त ने बताया कि एनएचएआई को अंडरपास व सुरक्षा दीवार बनानी थी। हमने उन्हें कई बार लिखा, अब तक लिख रहे हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। हाइवे का मामला था, इसलिए काम बंद कराने जैसा कदम नहीं उठाया जा सकता था।

एनएचएआई परियोजना निदेशक अनुपम गुप्ता ने बातया कि मैंने कुछ दिन पहले ही ज्वॉइन किया है। मैं इस मामले को देखूंगा। यदि हमारी शर्तों में होगा तो हम वन विभाग से बात कर आगे की कार्रवाई करेंगे।
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