कोटा. चंबल में मिलने वाली स्थानीय मछलियों की कई प्रजातियों पर संकट आ गया है। इसकी वजह हैं बिग हेड कार्प (इसका सिर बड़ा होता है) और सिल्वर कार्प मछली। चीनी प्रजाति की ये मछलियां चंबल में मिलने वाली मछलियों का भोजन खा जाती हैं। इनके खाने की रफ्तार इतनी तेज होती है कि स्थानीय मछलियों के लिए भोजन की कमी होती जा रही है। जबकि शैवाल और कंजी की अच्छी खुराक मिलने से चीनी मछलियों की संख्या बढ़ती जा रही है।
ऑल इंडिया गेम फिशिंग एसोसिएशन के राजस्थान सचिव सुमीत एडविन का कहना है कि चंबल में इस समस्या का समाधान नहीं हुआ तो यहां की रहू , कलोट, बाडस, मिरगल मछलियों की प्रजातियों पर संकट हो जाएगा। वो पिछले 2 साल से चंबल और अन्य स्थानों पर मिलने वाली मछलियों पर काम कर हैं।
एक साल में 8 किलो की हो जाती है चीनी मछली
बिग हेड कार्प: ये मछली सभी क्लाइमेट में सरवाइव कर सकती है। फिमेल बिग हेड कॉर्प एक साल में 1.9 मिलियन अंडे देती है। एक साल में ही इसका वजन 8 किलो से अधिक हो जाता है। लंबाई 1.4 मीटर तक हो जाती है। अमेरिका में इस पर बैन है। हर साल सरकार वहां इसके खात्मे के लिए प्रयास करती है।
कहां से आई: इसके बीज कलकत्ता से आते हैं। ठेकेदार भी कई बार इसके बीज तालाबों में डाल देते हैं। चंबल की डाउन स्ट्रीम से ये मछलियां गंगा सहित अन्य सहायक नदियों में भी पहुंच जाएंगी।
समाधान क्या
इनकी संख्या को रोकने के लिए राज्य सरकार की ओर से प्लानिंग तैयार कर प्रयास किया जाना चाहिए। मत्स्य विभाग की ओर से दिए जाने वाले मछली के ठेकों पर चौकसी रखे। ताकि इस प्रजाति के बीज तालाबों आदि में नहीं डाला जा सके।
प्रदेश में बैन है चीनी मछली
मत्स्य विभाग के कार्यवाहक सहायक उपनिदेशक एसके तिवारी ने बताया कि यह चाइनीज मछली राजस्थान में पूरे प्रदेश में बैन है। हम जिसे ठेका देते हैं उसे चाइनीज मछली को डालने नहीं दिया जाता है। ये पानी के सहारे चंबल में आ गई होगी। ठेके में इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ राजस्थान मत्स्य अधिनियम 1953 नियम 1958 के तहत कार्रवाई का प्रावधान है। इसमें ठेकेदार का लाइसेंस निरस्त किया जा सकता है।
कृषि एवं फिशरीज मंत्री प्रभुलाल सैनी ने बताया कि इस संबंध में अभी मुझे जानकारी नहीं है। स्थानीय अधिकारियों से इसकी जानकारी मंगवाई जाएगी। इसके बाद ही कुछ समाधान किया जा सकेगा।