यह आम आदमी के बस में तो है ही नहीं। रंगकर्मियों ने दबाव बनाया तो यूआईटी ने उनके लिए दर आधी कर 35 हजार रुपए कर दी, लेकिन रंग कर्मियों के लिए अब भी यह बहुत ज्यादा है।
यही नहीं, ऑडिटोरियम का कमर्शियल किराया भी जयपुर के बिड़ला ऑडिटोरियम, जवाहर कला केंद्र और रवींद्र रंगमंच से कई गुना ज्यादा है।
रंगकर्मियों का कहना है कि वे तो चंदा करके कार्यक्रम करते हैं, ऑडिटोयिरम के लिए 35 हजार रुपए कहां से लाएं। इसका लोकार्पण पिछले साल 23 सितंबर को तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गांधी फिल्म देखकर किया था।
जवाहर रंगमंच मिल जाता है ढाई हजार में
जयपुर के रवींद्र रंगमंच को भी रंगकर्मियों के लिए ही जाना जाता है। लेकिन, यहां की दर कोटा के मुकाबले कुछ भी नहीं है। रवींद्र रंगमंच में रजिस्टर्ड संस्थाओं को एक कार्यक्रम के लिए मात्र ढाई हजार रुपए का शुल्क देना पड़ता है।
यही नहीं, जो रजिस्टर्ड नहीं हैं, उन्हें भी शुल्क के नाम पर केवल 10 हजार रुपए देने होते हैं। जवाहर कला केंद्र की दर भी 10 हजार रुपए ही है। बिड़ला ऑडिटोरियम में तो बिना छूट के कमर्शियल दर ही 52 हजार रुपए है।
प्रदेश का सबसे महंगा ऑडिटोरियम
कोटा का ऑडिटोरियम किराए के हिसाब से प्रदेश में सबसे महंगा ऑडिटोरियम हैं। कोटा के ऑडिटोरियम की सामान्य दर 70 हजार रुपए है। जबकि रियायती 35 हजार है। इसके अलावा जयपुर के बिड़ला ऑडिटोरियम, अजमेर के जवाहर रंगमंच का किराया काफी कम है। अजमेर जवाहर रंगमंच के किराए में वाणिज्यिक संस्था को 10 हजार और अन्य संस्थानों को 7 हजार रुपए रिफंड किए जाने का भी प्रावधान है।
एक नजर में ऑडीटोरियम
10 हजार वर्गफीट क्षेत्रफल
800 लोगों के बैठने की क्षमता (एसी)
2.50 लाख रखरखाव पर खर्च
5.26 लाख आय सालभर में
किराया एक नजर
शहर: ऑडिटोरियम किराया प्रतिदिन
जयपुर: बिड़ला ऑडिटोरियम 52 हजार
जयपुर: रविंद्र मंच 10 हजार
जयपुर: ओटीएस 30 हजार
अजमेर: जवाहर रंगमंच 23,460
अलवर: प्रताप 21 हजार
उदयपुर: सुखाड़िया ऑडिटोरियम 15 हजार
जोधपुर: जेएनवी स्मृति भवन 10 हजार
(नोट: किराया वाणिज्यिक संस्थानों का है।)
इधर कोटा में
15 साल संघर्ष, मिला कुछ नहीं
शहर के नाट्य कलाकारों व रंगकर्मियों ने कोटा में ऑडिटोरियम के लिए 15 साल तक संघर्ष किया। निर्माण शुरू हुआ तो उम्मीद बंधी कि अपने शहर में कला का प्रदर्शन करने के लिए स्थान मिलेगा। लेकिन, यूआईटी ने उनके लिए भी फीस 35 हजार रुपए रख दी तो उनके सपने टूट गए। उन्होंने यूआईटी के अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई, लेकिन उनकी बात को अनुसुना कर दिया गया।
कमाना था तो ब्याज ही सवा करोड़ मिलता
ऑडिटोरियम न तो रंगकर्मियों के काम आ पा रहा है और न यूआईटी की आय बढ़ा पा रहा है। साल में किराए से यूआईटी को मात्र सवा 5 लाख रुपए मिले। जबकि, यही पैसा यदि फिक्स डिपॉजिट में डाला जाता तो 9 फीसदी की दर से एक साल में सवा करोड़ रुपए ब्याज मिलता। यह बात साफ कह रही है कि यूआईटी के अधिकारियों में कितनी दूरदर्शिता है।
बिखर रही उम्मीदें
संघर्ष का यह सिला मिला
'ऑडिटोरियम के लिए हमने ही संघर्ष किया और हम ही इससे वंचित हैं। कहने को तो इसे रंगकर्मियों के लिए बनाया, लेकिन किराया इतना कर दिया कि कोई इसमें कार्यक्रम कर ही नहीं सके। शहर की 17 संस्थाएं कार्यक्रमों के लिए दूसरी जगह तलाशती रहती हैं।'
-डॉ. उदय मणि कौशिक, उपाध्यक्ष रंगकर्मी एकता मंच
कहां से दें पैसे, कमाई थोड़े ही है
'जेब से पैसे लगाकर नाटक करते हैं। एक नाटक पर 25 हजार खर्च आता है। ऑडिटोरियम नहीं मिलता, इसलिए आर्ट गैलेरी में करना पड़ता है, यहां न लाइट है न बैठने की जगह, परंतु इस कला को जिंदा रखने के लिए प्रयास जारी है।'
- राजेन्द्र पांचाल, निदेशक पैराफिन संस्था
हमारे साथ मजाक किया है
'सरकार व प्रशासन ने कोटा में ऑडिटोरियम बनाकर हमारे साथ मजाक किया है। यहां पूरा दिन तो क्या दो घंटे के लिए भी कार्यक्रम नहीं कर सकते। इसे बनते हुए देखते थे तो उम्मीद थी कि कलाकारों को कला दिखाने का मौका मिलेगा।'
-संदीप राय, रंगकर्मी
रंगमंच दिवस पर भी राहत नहीं
'प्रशासन की हठधर्मिता के कारण दो साल से विश्व रंगमंच दिवस पर भी यहां कोई कार्यक्रम नहीं हो रहा।'
-सुभाष सोरल, कंचन युवा मंडल
रेट कम हो
' रंगकर्मियों के लिए ऑडिटोरियम बनाया गया है, तो इसका लाभ उन्हें मिलना ही चाहिए। इसकी दरें काफी अधिक है, फाइल मंगवाकर देखेंगे, कैसे इसे कम किया जा सकता है। अन्य शहरों के आॅडिटोरियम की दरों को मंगवाकर देखा जाएगा। वहां किस प्रकार से कम दरों पर दिया जा रहा है।'
-जोगाराम, कलेक्टर