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कोटा की स्थापना और संस्थापक को लेकर विवाद गहराया, धारीवाल ने दी सफाई

8 वर्ष पहले
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कोटा। कोटा की स्थापना और संस्थापक को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। अपने भाषणों में कोटिया भील को कोटा का संस्थापक बताने वाले स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल अब भी कह रहे हैं कि उन्होंने जो इतिहास पढ़ा है उसमें यही बात थी। जनप्रतिनिधियों द्वारा कोटा का संस्थापक कोटिया भील को बताने पर महाराव बृजराज सिंह ने आपत्ति की थी और सही इतिहास बताते हुए कोटा की स्थापना राजा जैतसी द्वारा करने की बात कही थी।

इतिहासकारों द्वारा लिखी पुस्तकों में भी यही उल्लेख है, लेकिन सरकारी विभागों नगर निगम, यूआईटी, कोटा जिला दर्शन व कोटा के मास्टर प्लान में कोटा की स्थापना को लेकर अलग-अलग तथ्य हैं। ज्यादातर तथ्य स्पष्ट कहने की बजाय इस ओर इशारा करते हैं कि कोटा का नामकरण कोटिया भील के नाम पर हो सकता है। पूर्व महाराव को भी इस पर आपत्ति नहीं है। वे संस्थापक की बात पर सवाल कर रहे हैं। वहीं मीणा समाज ने महाराव के बयान की निंदा की है। समाज अध्यक्ष का कहना है कि उन्होंने बीए प्रथम वर्ष की किताब व समाजों की किताबों में यही पढ़ा है। वहीं यूआईटी अध्यक्ष दूसरे दिन भी इस मामले में कुछ भी कहने से बचते रहे। वे कोई तथ्य भी नहीं दे पाए।

स्पष्ट बताने की बजाय भ्रमित कर रहे सरकारी विभाग

जिला प्रशासन और यूआईटी की वेबसाइट पर लिखा है कि जैतसिंह ने कोटिया भील को मारकर वहीं गढ़ की स्थापना की। वहीं नीचे लिखा है वर्तमान में कोटा इसकी स्थापना के लिए योद्धा कोटिया भील का ऋणी है, जिसने ८०० साल पहले अकेलगढ़ के पास छोटी सी किलेबंदी की थी और रेतवाली की ओर जाने वाले सभी रास्तों को रोकने के लिए मिट्टी की दीवार बनाई। इसमें कहीं भी संदर्भ नहीं है।

राजस्थान सरकार के 4 साल पूरे होने पर प्रकाशित की गई 'कोटा जिला दर्शनÓ पुस्तक में पेज नंबर 1 पर कोटा का संक्षिप्त इतिहास कुछ इस प्रकार लिखा है- अभिलेखों के अनुसार चंबल नदी के पूर्व में स्थित अकेलगढ़ जिसका कि शासक कोटिया भील था। उसने कोटा नगर बसाया था। जिसका नाम उसने कोटाह (कोटा) रखा था। सन 1625 तक कोटा परगना बूंदी राज्य के अधीन रहा। बाद में मुगल बादशाह जहांगीर ने राजा राव रतन सिंह के पुत्र माधोसिंह की शूर वीरता से प्रसन्न होकर उसे कोटा एवं उसके बाद 360 गांव भेंट किए। माधोसिंह को कोटा का प्रमुख बनाया गया। बाद में कोटा को अलग राज्य घोषित कर दिया गया। यहां के शासक महाराव कहलाने लगे।

कोटा का मास्टर प्लान के पेज नंबर नंबर 1 व 2- लगभग 670 वर्ष पूर्व कोटा, भील आदिवासियों की एक छोटी सी आबादी थी, जहां पर मिट्टी की झोपडिय़ां एवं एक छोटा सा किला था। इसका नाम भीलों के मुखिया कोटिया के नाम पर रखा गया था। चौदहवीं शताब्दी के मध्य में बूंदी के हाड़ा राजपूतों ने जीतकर लगभग दो शताब्दी बाद चंबल नदी कि किनारे एक किला बनाया। आबादी के विस्तार के साथ उत्तर एवं पूर्व में और परकोटे बनवाए गए।

इतिहासकार व लेखकों ने ये लिखा

लेखक जगदीश सिंह गहलोत की राजपूताने का इतिहास-1960 के पेज नंबर 46- 'जैतसिंह ने चंबल नदी के दाहिने किनारे पर भीलों के राज्य पर चढ़ाई कर भीलों को हराया। उस वक्त भीलों की राजधानी अकेलगढ़ (वर्तमान कोटा से 5 मील दक्षिण-पश्चिम) थी।Ó भीलों के कई छोटे-छोटे राज्य अकेलगढ़ से दक्षिण पूर्व मुकंदरा पर्वतमाला के साथ-साथ मनोहर थाने तक फैले हुए थे। भीलों का प्रसिद्ध सरदार कोटया था, जिसके नाम पर कोटा नगर बसा था।
राजस्थान के पहले डी-लिट उपाधि धारक डॉ. मथुरालाल शर्मा द्वारा लिखी कोटा राज्य का इतिहास के अनुसार- सच तो यह है कि कोटिया के जीवनकाल में आज जहां कोटा है, वहां कोई बस्ती ही नहीं बसी थी। जैतसी ने जिस टेकरी पर पर कोटिया भील को मारा था उसी के पास उसका अंतिम संस्कार हुआ। गढ़ में इस स्थान तथा यहां रखे पत्थरों को कोटिया भैंरू कहकर पूजा जाता है। इसी पर इस बस्ती का नाम आगे चलकर कोटा पड़ा।

गढ़ पैलेस पर ये लिखा- 'बूंदी के राजकुमार जैतसिंह ने 1264 ईसवी में कोटा गढ़ की आधारशिला रखी थी। (स्थापना की थी) उन्होंने यहां के उत्पाती भील प्रमुख कोटिया का वध कर आसपास के भू भाग को विजित किया तथा इस गढ़ की प्रथम प्राचीर (परकोटा) का निर्माण कराया।Ó

पूर्व महाराव ने जो पढ़ा होगा, वे बोल रहे हैं-मंत्री

कोटा के बारे में मैंने जो इतिहास पढ़ा था वो बोल दिया। पूर्व महाराव ने जो इतिहास पढ़ा होगा वे बोल रहे होंगे। ये अपने-अपने विचार हो सकते हैं। जैतसी ने तो बूंदी में जैता सागर बनाया था और कोटिया भील का कत्ल किया था और फिर उसके नाम पर ही कोटा का नाम रखा था। -शांति धारीवाल, स्वायत्त शासन मंत्री

यूआईटी चेयरमैन दूसरे दिन भी बोले- नो कमेंट्स

इस मामले में मुझे कुछ नहीं कहना। मुझे कुछ भी नहीं पता। नो कमेंट्स, नो कमेंट्स, नो कमेंट्स। -रवींद्र त्यागी, यूआईटी अध्यक्ष

मीणा समाज ने जताया रोष

जय मीनेष (मीणा) छात्र विकास समिति के बैनर तले समाज के लोगों की शनिवार को नेहरू गार्डन में बैठक हुई। समिति अध्यक्ष रामचरण मीणा के अनुसार बैठक में पूर्व महाराव बृजराज सिंह के बयान पर रोष जताया। सभी ने उनके बयान को दुर्भाग्यपूर्ण और कोटा के संस्थापक कोटिया भील का अपमान बताया। पूर्व महाराव को केवल स्वयं का इतिहास पता है। उनको दूसरों के इतिहास से नफरत होती है। महाराव बृजराज सिंह दिग्भ्रमित हैं। उन्होंने न केवल इतिहास को चुनौती दी है, बल्कि भील समाज और आदिवासी समाज के गौरव को चुनौती दी है। बैठक को सत्यनारायण पीलवान, किरोड़ीलाल, लाखन, राजेंद्र, सुरेंद्र आदि ने संबोधित किया।

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