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विजयादशमी पर पैरों से रौंदा जाता है रावण, जेठी समाज की अनोखी परंपरा

7 वर्ष पहले
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कोटा. गुजरात के देलमाल से आए जेठी परिवार ने वर्षों पुरानी मिट्टी के रावण बनाने की परंपरा आज भी सहेज रखा है। नांता और किशोरपुरा में हर साल अखाड़े की मिट्टी से रावण तैयार किया जा रहा है। समाज के पुजारी श्यामसुंदर बताते हैं कि विजयादशमी के दिन समाजबंधु पैरों से रौंद कर रावण का अंत करते हैं।

रावण श्री लिम्जा माता के सामने बनाया जाता है। अखाड़े की मिट्टी काम में लेते हैं। पानी डालकर मिट्टी में रावण की आंखें, नाक, कान, मुंह, मूंछें उकेरी जाती हैं। जिसे आकार देने के लिए ज्वारे बोए जाते हैं। सिर पर मुकुट बनाकर आंधीझाड़ा का पौधा लगाया जाता है। नौ दिनों तक भीतरिया (रावण बनने की जगह पर रहने वाले व्यक्ति) रहते हैं। जो हर दिन पानी का छिड़काव करते हैं।
विजयादशमी से पहले यहां कोई प्रवेश नहीं करता है। विजयादशमी पर समाजबंधु मिट्टी के रावण को पैरों से रौंदते हैं। ज्वारे को लूटते हैं। सफेद ज्वारा समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद कुश्ती होती है। परंपरागत गरबा भी होता है।

92 साल के शंभूलाल जेठी बताते हैं कि हाड़ौती में समाज की राजे-रजवाड़े के समय से ही मिट्टी के रावण बनाने की परंपरा है। इस परंपरा की पहचान और संबल के लिए आजादी के बाद सरकारी स्तर पर प्रयास नहीं हो पाए हैं।
समाज की अपनी पहचान भी नहीं बनी है। जेठी समाज के चंदा पहलवान ने उम्मेदसिंह द्वितीय के समय ईरान के पहलवानों से कुश्ती जीती थी। गुजरात की यह परंपरा हाड़ौती में आज भी कायम है।
आगे की स्लाइड में देखें मिट्टी के रावण और समाज के पुजारी श्यामसुंदर को जिन्होंने इस बारे में बताया