मसाले की खेती; कम लागत में ज्यादा उत्पादन और अनुदान भी
} यादवेंद्रसिंह राठौड़ . सीकर
प्रदेशमें किसानों का रुझान मसाला खेती की ओर बढ़ रहा है। राज्य में ही बाजार होने से किसानों को फसल बेचने में ज्यादा परेशानी नहीं होती है। मसाला खेती के बढ़ने से विभिन्न जिलों में इससे संबंधित उद्योग भी खुलने लगे हैं। केन्द्र सरकार के साथ ही राज्य सरकार ने भी मसाला खेती को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रखी हंै। राजस्थान धनिया, मैथी अजवायन के उत्पादन में अग्रणी राज्य है इसके साथ ही जीरा भी बड़ी मात्रा में उत्पादन होता है।
राज्य के दूर दराज के निर्जन मरूस्थलीय क्षेत्रों में स्थित विषम जलवायु में भी मसाला उत्पादित किया जा रहा है। कम लागत में अच्छी पैदावार के साथ ही बाजार में इससे अच्छी आय मिल जाती है। इसलिए राजस्थान और गुजरात देशभर में बीज मसालों के कटोरे के नाम से जाने जाते हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा बीज मसाला उत्पादक उपभोक्ता देश है। दुनिया की करीब 60 प्रतिशत मसाला की आपूर्ति भारत से ही होती है। देश में हर साल अनुमानित 12.50 लाख हैक्टेयर में मसालों की खेती होती है जिससे करीब 10.5 लाख टन मसालों का उत्पादन होता है। इनमें जीरा धनिया अकेले करीब 10 लाख है. क्षेत्र में उगाया जाता है। लोगों की फूड हैबिट्स में काफी बदलाव आने के चलते स्वाद के लिहाज से चटखारेदार खाना पसंद करने लगे हैं। मसाला मूलतः वनस्पति उत्पाद या उनका मिश्रण होता है, जो खाद्य पदार्थों को सुगंधित स्वाद बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मसाला कई बीमारियाें से छुटकारा दिलाता है।
जीरा नागाैर,जैसलमेर, पाली, जोधपुर, जालोर, बाड़मेर, अजमेर
रुपए प्रति हैक्टेयर अधिकतम अनुदान दिया जाता है मसाला फसलों की खेती के लिए।
दिन में तैयार होती है अजवाइन की नई किस्म एए-1,2। सामान्यत: यह फसल 180 दिन में तैयार होती है।
राज्य सरकार राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत मसाले की खेती के साथ ही इससे संबंधित उद्योग इकाई लगाने, भंडार गृह बनाने, छंटाई करने ग्रेडिंग, शॉर्टिंंग, कोल्ड स्टोरेज के लिए अनुदान दे रही है। इसके साथ ही किसानों को मसाला खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। राजस्थान से धनिया, मेथी, अजवाइन, जीरा सहित अन्य मसालों का बड़े स्तर पर निर्यात भी किया जाता है। -प्रभुलाल सैनी, कृषि मंत्री
मसाले की उन्नत किस्म
राष्ट्रीयबीजीय मसाला अनुसंधान केन्द्र, अजमेर (एनआरसीएसएस) के निदेशक ने बताया कि भारतीय मसाला बोर्ड सहित अन्य संस्थानों ने मसाला खेती के नए तरीके इजाद करने के साथ ही नई किस्म के बीज तैयार की हंै, जिससे कि कम समय में अधिक गुणवत्ता वाले मसालों का उत्पादन किया जा सके। कृषि वैज्ञानिकों ने अजवाइन की नई किस्म तैयार की है जो 135 से 140 दिन में तैयार हो जाती है। सामान्यत: यह फसल 180 दिन में तैयार होती है। मेथी-3 किस्म भी इसी का परिणाम है।
रामगंजमंडीमें मसाला पार्क
राजस्थानसरकार ने कोटा के रामगंजमंडी में मसाला पार्क विकसित करने के लिए मसाला बोर्ड को 30 एकड़ जमीन आवंटित की है। मसाला पार्क में मसालों की ग्रेडिंग, छंटाई करने, शॉर्टिंंग करने के साथ ही प्रसंस्करण उद्योग लगाने और पैकेजिंग के साथ ही कोल्ड स्टोरेज तैयार किए जाएंगे। यहां से किसानों को उन्नत बीज भी उपलब्ध करवाए जाएंगे। राज्य में छोटे-छोटे क्षेत्रों में मिर्च, हल्दी, धनिया, जीरा आदी उत्पादित होते हैं ऐसे में यहां इंडस्ट्री लगाने के बजाय छोटी प्रोसेसिंग यूनिट लगाने पर जोर दे दिया जा रहा है।
कृषि विभाग के उपनिदेशक डॉ. अतर सिंह मीना ने बताया कि रष्ट्रीय बागवानी मिशन में कोल्ड स्टोरेज पर अधिकतम 4 करोड़ रुपए तक का अनुदान दिया जा सकता है। मसाले से संबंधित प्रसंस्करण इकाई लगाने के लिए लागत का 40 प्रतिशत और अधिकतम 10 लाख रुपए अनुदान के रूप में दिया जाता है। छंटाई करने ग्रेडिंग, शॉर्टिंंग के लिए सरकार 35 प्रतिशत अनुदान देती है, इसकी इकाई लगाने के लिए करीब 50 लाख रुपए तक लागत आती है। पैकिंग इकाई लगाने के लिए करीब 15 लाख रुपए का खर्चा आता है जिसमें 40 प्रतिशत अनुदान दिया जाता है। मसाला फसलों की खेती के लिए लागत का 40 प्रतिशत या अधिकतम 5500 रुपए प्रति हैक्टेयर अनुदान दिया जाता है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत मसाला की खेती को बढावा देने के लिए कृषि विभाग खेती की लागत का 50 प्रतिशत तक अनुदान दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत फव्वारा, स्प्रिंक्लर, बूंद- बूंद सिंचाई के साथ ही अन्य पर भी अनुदान है। जैविक खेती में मसाला उत्पादन करने वाले किसानों को अतिरिक्त अनुदान दिया जाता है। मसाले की जैविक खेती करने वाले किसानों को लागत का 50 प्रतिशत या अधिकतम 10 हजार रुपए प्रति हैक्टेयर के रूप में अनुदान दिया जाता है। कीट रोग प्रबंधन के लिए लागत का 30 प्रतिशत 1200 रुपए प्रति हैक्टेयर अनुदान है।
अजवाइन
लहसुन
कोटा, बांरा, बूंदी, झालावाड़, जोधपुर, प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़
उदयपुर, प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, नागौर, टाेंक, जयपुर
शुद्धता के लिए एगमार्क जरूरी
सरकारप्रमाणीकरण चिह्न से उपभोक्ता को कृषि उत्पादों की शुद्धता एवं गुणवत्ता का भरोसा देती है। शहद, सरसों का तेल, गरम मसाला, पिसी हल्दी, पिसा धनिया, पिसी मिर्च के लिए एगमार्क जरूरी है। यह दिल्ली से मिलता है। एगमार्क प्रमाणपत्र लेने से उत्पादन को किसान देश में कहीं भी अच्छे दाम पर बेच सकते हैं।
सिरोही, टोंक, चित्तौड़गढ़
आदि
जोधपुर, नागौर,
टोंक
आदि
सौंफ
मिर्च
सीकर, चूरू झुंझुनूं, बीकानेर, जयपुर
कोटा,
बांरा, झालावाड़, बूंदी
मेथी
धनिया