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रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक रामचरण महाप्रभु

Dainik Bhaskar

Feb 06, 2012, 02:24 AM IST

Shahpura News - मूलचंद पेसवानी. शाहपुरा निर्गुणधारा की ज्ञानमार्गी शाखा में कालांतर में जो संप्रदाय अस्तित्व में आए, उनमें...

रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक रामचरण महाप्रभु
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मूलचंद पेसवानी. शाहपुरा
निर्गुणधारा की ज्ञानमार्गी शाखा में कालांतर में जो संप्रदाय अस्तित्व में आए, उनमें रामस्नेही संप्रदाय अनेक दृष्टियों से वैशिष्टपूर्ण है। रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक आद्याचार्य स्वामी रामचरण जी महाप्रभु की जयंती 6 फरवरी को है। रामानंद संप्रदाय की बारहवीं पद्धति में संतदासजी तपस्वी संत हुए। उनके द्वारा स्थापित गूदड़ पंथ के ही संत रामचरणजी थे, जिन्होंने आगे चलकर रामस्नेही संप्रदाय की स्थापना की, जिसका मुख्यालय अभी शाहपुरा जिला भीलवाड़ा में रामनिवास धाम है।
रामचरणजी महाराज का जन्म तत्कालीन जयपुर राज्य में मालपुरा के निकट सोडा ग्राम में बखतराम विजयवर्गीय के यहां विक्रम संवत 1776 माघ शुक्ला चर्तुदर्शी शनिवार को हुआ। उनका जन्म नाम रामकिशन था। जयपुर सेवा में रहते हुए उनके पिता का देहावसान पर वो गांव आये। पिता के मौसर करने के बाद उसी रात्रि में रामचरणजी को स्वप्न आया। जिसमें वो नदी की धारा में बहे जा रहे है, बचाने के लिए चिल्लाने पर संत आए, हाथ पकड़ बाहर निकाला तथा अंर्तध्यान हो गए। इस घटना से विचलित रामचरण उस संत की तलाश में निकल पड़े। शाहपुरा के पास दांतड़ा में संत कृपारामजी वो ही संत थे जिनका दर्शन स्वप्न में हुआ था। संत कृपारामजी से वैराग्य के महत्व व योग साधना प्राप्त करने के बाद विक्रम संवत 1808 भाद्रपद शुक्ला सप्तमी गुरुवार को राम मंत्र से उन्होंने दीक्षा प्राप्त कर ली। दीक्षा के बाद ही रामकिशन से उनका नाम रामचरण किया गया। दीक्षित होते ही रामचरण ने गूदड़ वेश धारण कर लिया। 7 वर्ष तक दांतड़ा में ही गोदी से दूर श्मशान को तपोस्थली बनाया। शाहपुरा के राजा रणसिंह के आमंत्रण पर स्वामी रामचरणजी संवत 1826 में शाहपुरा आए ओर श्मशान भूमि को ही अपनी तपोस्थली बनाया। यहां वो रामनाम की साधना में लीन हुए तथा आने वालों को उपदेश देते। स्वामी ने अपने अंतिम वर्ष शाहपुरा में ही व्यतीत किए। वैशाख कृष्णा पंचमी विक्रम संवत 1855 को पार्थिव देह से अनासक्त होकर ब्रह्मपद को प्राप्त किया। शाहपुरा में रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक रामचरणजी की मुख्य गादी एवं उनके समाधि स्थल स्तंभजी के दर्शन कर भक्तजन मन्नत मांगते हैं। पूरी होने पर मिश्री व चढ़ावा चढ़ाते है।

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