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धार्मिक होने के लिए नैतिकता पहली शर्त : मुनि

7 वर्ष पहले
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राष्ट्रसंतजैनाचार्य पदमसागरसूरीश्वर महाराज के शिष्य प्रवचनकार मुनि विमलसागर महाराज ने कहा कि नैतिकता धर्म की बुनियाद है। धार्मिक होने के लिए लिए नैतिक होना पहली शर्त है। अधर्म और अनीति सदैव साथ चलते हैं। धर्म तो नैतिकता के बिना कभी प्रगति नहीं करता। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि लोग रात-दिन धर्म-उपासना के लिए भागदौड़ करते हैं, लेकिन नैतिक बनने या नैतिक रहने की भी चिंता नहीं करते। नैतिकता के बिना जीवन की सुचिता संभव नहीं है। फिर धर्म मनुष्य के लिए कैसे कल्याणकारी बन सकता है। सोमवार को लूनी नदी के तट पर भगवान महावीर गौशाला प्रांगण में आयोजित जनसभा को संबोधित करते हुए मुनि विमलसागर महाराज ने यह बात कही।

उन्होंने कहा कि धर्म-आराधना का अर्थ सिर्फ क्रिया कांड या अनुष्ठान विधियां करते रहना ही नहीं है, बल्कि धर्म की साधना का स्पष्ट तात्पर्य है। अगर धर्म स्थानों में जाकर भी हम अच्छे इंसान बनकर नहीं लौटते हैं तो मानो सब बेकार हैं। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर और गुरुद्वारे चमत्कारों के लिए नहीं, पशुता छोड़कर मानवता की शिक्षाएं ग्रहण करने के लिए हैं।

मुनि विमलसागर महाराज ने सभी को झकझोरते हुए कहा कि नैतिकता में अदभुत शक्ति है। बड़ी से बड़ी संपदा और साम्राज्य भी नैतिकता के समक्ष फीके लगते हैं। हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी गलत इच्छाएं हमें बर्बाद कर रही हैं। हमारी सोच इतनी नीचे गर चुकी है कि हम अपने हित-अहित का भी ठीक से नहीं सोच पा रहे है। वरना नैतिकता की शक्ति के सामने कोई जीत नहीं सकता। अफसोस है कि आज शेयर बाजार का इंडेक्स तो ऊपर जा रहा है, लेकिन जीवन में नैतिकता का इंडेक्स निरंतर नीचे गिरता जा रहा है। आज का इंसान यह समझ नहीं पा रहा कि पाए हुए धन के बजाय कमाया हुआ धन महत्वपूर्ण और स्थाई होता है। मुनि विमलसागर महाराज ने आगे कहा कि आज असली के बजाय नकली अधिक चमकदार लग रहा है। जहां देखो वहां झूठ, चोरी, बेईमानी, मिलावट विश्वासघात आदि का ऐसा साम्राज्य फैला है कि विश्वस कर पानी मुश्किल हो गया है। इस दौर में सभी बेहद परेशान हैं, लेकिन नैतिकता का आंदोलन चलाने काे कोई आगे नहीं रहा। जीवन मूल्यों का ह्रास भ्रष्टाचार को जन्म देता है। नैतिकता की साधना के बगैर जीवन का शांति नहीं मिल सकती। मुनि ने कहा कि बड़े-बड़े धार्मिक आयोजनों के बजाय सच्ची इंसानियत की तलाश में सभी को निकल पड़ना चाहिए। जब इंसानियत