यहां भी संक्रमण का खतरा, संसाधन कम
उपखंडके सबसे बड़े राजकीय नाहटा अस्पताल का लेबर रूम समस्याओं से जकड़ा है। यहां प्रसूताओं की डिलीवरी में जितनी जोखिम रहती है, उतना ही खतरा संक्रमण का बना रहता है। इसके बावजूद यहां हर माह 300 डिलीवरी होती है, क्योंकि उपखंड के सभी अस्पतालों के केसेज यहां रेफर किए जाते हैं, लेकिन यहां स्टाफ की कमी के चलते उन्हें संभालना बेहद मुश्किल हो जाता है। डिलीवरी केसेज के सामने यहां के संसाधन बौने साबित हो रहे हैं। यहां तक कि लेबर रूम में पानी सप्ताह में केवल तीन दिन ही नलों में आता है, जबकि यहां पानी की आवश्यकता पल-पल पर रहती है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में राज्य सरकार ने दैनिक भास्कर की खोजपरक खबरों के बाद लेबर रूम की स्थिति सुधारने के निर्देश दे रखे हैं, मगर यहां का अस्पताल प्रशासन अभी तक नहीं चेता है।
धड़कनहै या नहीं, पता नहीं
लेबररूम में सबसे आवश्यक संसाधन डॉप्लर, जिसके माध्यम से शिशु की धड़कन महसूस की जाती है, लेकिन यह मशीन यहां पिछले एक माह से खराब पड़ी है। इसके चलते प्रभारी डॉक्टर की उपस्थिति में तो स्टेथेस्कोप से धड़कन जांच कर लेते हैं, लेकिन उनकी अनुपस्थिति में स्थिति मुश्किलों भरी हो जाती है। इसके अलावा बीपी स्टूमेंट भी खराब पड़ा है, जिसके चलते यहां मरीज की बीपी की भी जांच नहीं कर सकते।
सैकड़ोंकेस, वार्ड महज दो
यहांहर माह सैकड़ों केसेज डिलीवरी होती है, जिनके अस्पताल में प्रवेश से लेकर सुरक्षित डिलीवरी तक वार्ड में ठहरने की सुविधा पर्याप्त नहीं होने से प्रसूताओं को परेशानियां झेलनी पड़ती है। यहां प्रसूताओं के लिए दो महज दो वार्ड हैं। यदि रुल्स फॉलो किए जाएं तो ऑपरेशन डिलीवरी के बाद प्रसूता को अलग वार्ड में शिफ्ट किया जाना चाहिए, जिससे संक्रमण का खतरा नहींं रहता है, लेकिन ऐसा यहां नही है। पैसेंट बढ़ने पर प्रसूताओं को पुरुष वार्ड में शिफ्ट कर दिया जाता है।
जोस्टाफ, उन पर अतिरिक्त भार
यहांप्रभारी डॉक्टर के अलावा पांच नर्सिंग स्टाफ है। जिनमें दो सुबह की शिफ्ट, एक दोपहर एक रात्रि की शिफ्ट में ड्यूटी देते हैं। परेशानी तब होती है, जब आपातकालीन स्थिति बनती है तो उपस्थित नर्सिंग स्टाफ के हाथ पांव फूल जाते हैं, क्यांेकि सुरक्षित डिलीवरी का दबाव एक स्टाफ से झेलना मुश्किल होता है। ऐसे में जब तक डॉक्टर नहीं जाती है, नर्सिंग स्टाफ की सांसे फूली रहती है। जबकि नियमानुसार हर पारी म