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मित्रता में गरीबी अमीरी का कोई स्थान नहीं : शास्त्री

5 वर्ष पहले
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भयका निवारण भागवत का फल है। देश, काल, पात्र अनुसार धर्म का निर्धारण होता है। भागवत कथा श्रवण के बाद कुछ पाना शेष नहीं रहता है। यह बात श्रीमद् भागवत का वाचन करते हुए कथा वाचक भरत शास्त्री ने कही।

शास्त्री ने कहा कि भगवान श्री कृष्ण सुदामा की मित्रता आज भी प्रशंसनीय है। मित्रता कभी अमीरी-गरीबी की मोहताज नहीं होती है। मित्रता निभाना भी एक फर्ज धर्म है। हमेशा मित्र के साथ सद्भाव सम्मान का व्यवहार रखे। शास्त्री ने कहा कि मित्रता में गरीबी या अमीरी का कोई स्थान नहीं है। उन्होंने कहा कि अर्जित धन की सार्थकता सच्चे अर्थों में तभी है जब उसे परोपकार के कार्यों में खर्च किया जाए। धर्म की जड़ पाताल में रहती है। उन्होंने कृष्ण-सुदामा की पूरी कथा बताई। उल्लेखनीय है कि यह भागवत कथा लालचंद पुत्र अमोलकचंद दवे मानावत के सांवतसरिक महा प्रसंग पर की जा रही है।

कृष्णसुदामा की झांकी रही आकर्षण

कथाके दौरान कृष्ण सुदामा की सुंदर झांकी का मंचन किया गया। इस दौरान भजन अरे द्वारपालों, कन्हैया से कह दो की प्रस्तुति दी गई, जिसे सुनकर श्रद्धालु भाव विभोर हाे गए। इससे पहले पंचायत समिति सदस्य राजेन्द्रसिंह राठौड़ ने अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर मंगलाराम, पुखराज सैन, भूराराम चौधरी, प्रधानाचार्य शांति स्वरूप शर्मा, नरपत सिसोदिया, माधुदास संत सहित ग्रामीण उपस्थित थे।

थोब. कथा के दौरान विभिन्न रूप धरे बच्चे।

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