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कमजोर इच्छाशक्ति, 7 साल से अधूरा स्टेडियम
शहर के जसोल फांटा के पास निर्माणाधीन महात्मा ज्योति बा फूले स्टेडियम स्वीकृति के सात वर्ष बाद भी मूर्तरूप नहीं ले पाया है। इसकी सबसे बड़ी वजह है नगरपरिषद के जिम्मेदार कारिंदों की कमजोर इच्छाशक्ति। उल्लेखनीय है कि करीब 7 साल पहले तत्कालीन पूर्व पालिकाध्यक्ष प्रभा सिंघवी के कार्यकाल में आईडीएचएमटी योजनांतर्गत स्टेडियम निर्माण की स्वीकृति मिली थी। तब तत्कालीन नगरपालिका ने जसोल फांटा के पास अवाप्त की गई जमीन पर स्टेडियम निर्माण के लिए खाका तैयार किया। 4 करोड़ की लागत से बनने वाले स्टेडियम के लिए पहली किश्त के रूप में 1 करोड़ का बजट मुहैया करवाया गया, जिससे तब निर्माण कार्य शुरू करवाया गया।
जानकारी के अनुसार इसके बाद दो किश्तों में एक करोड़ रुपए का बजट मिलने पर नगरपरिषद की ओर से खेल मैदान, पैवेलियन, ड्रेसिंग कक्ष, वीआईपी कक्ष आदि का निर्माण करवाया। निर्माण कार्य चल रहा था कि जैसे ही बाउंड्री का काम आया तो एक कॉर्नर में नजदीक की जमीन वालों ने उसे अपनी जमीन बताते हुए विवाद खड़ा कर दिया। इसके बाद ठेकेदार ने भी काम में रुचि नहीं दिखाई। स्टेडियम के लिए एक किश्त में 50 लाख रुपए का बजट मिला, लेकिन विवाद के चलते ठेकेदार ने काम शुरू नहीं किया और तय समय पर बजट का उपयोग नहीं होने से बजट लैप्स हो गया। इसके बाद से अब तक करीब ढाई साल हो गए हैं, अभी तक स्टेडियम निर्माण का कार्य बाउंड्री निर्माण पर ही अटका पड़ा है।
लाखोंखर्च, नतीजा सिफर
स्टेडियमनिर्माण के दौरान यहां ग्राउंड में हरी दूब लगाई गई थी। इसके बाद स्टेडियम के लिए पर्याप्त ढांचा काफी हद तक तैयार भी हो गया था, लेकिन जब से निर्माण कार्य ठप पड़ा है, तब से लेकर यहां असामाजिक तत्वों का जमावड़ा रहता है। ठेकेदार की ओर से डाली गई निर्माण सामग्री भी अनुपयोगी हो गई है। बाउंड्री नहीं बनने से आवारा पशुओं का जमावड़ा रहता है, जिन्होंने हरी दूब का नामोनिशान तक नहीं रखा। नियमित देखरेख के अभाव में जगह-जगह कंटीली झाडिय़ां उग गई है।
खेलप्रतिभाएं हताश-
शहरसे खेल प्रतिभाओं को आगे आने का मौका मिले और वे ऊंचे लेवल पर अपनी प्रतिभाओं का निखार कर सकें, इसके लिए स्टेडियम की स्वीकृति प्रदान की थी। मगर जिम्मेदारों की उदासीनता के चलते यह सपना संजोये बैठी खेल प्रतिभाओं को हताशा ही मिल रही है। बालोतरा में स्टेडियम के बावजूद ऊंच लेवल के खेल आयोजन होते है