- Hindi News
- ... तू मिला तो मैंने पाया जीने का नया सहारा
... तू मिला तो मैंने पाया जीने का नया सहारा
आजउंगली थाम के तेरी तुझे मैं चलना सिखलाऊं, कल हाथ पकड़ना मेरा जब मैं बूढ़ा हो जाऊं
तू मिला तो मैंने पाया, जीने का नया सहारा, मेरा नाम करेगा रोशन जब में मेरा राज दुलारा।
यह अंतरा 1969 में बनी फिल्म एक फूल दो माली का है, लेकिन आज भी हर परिवार में माता पिता की यही उम्मीदें है। खासकर तब जब उनका शरीर थक चुका होता है। लेकिन, एक सच्चाई यह भी है कि काम धंधे के लिए शहर से दूर गए बेटे अपने माता पिता का चाहकर भी ध्यान नहीं रख पाते। ऐसे लोगों की सेवा का जिम्मा उठाया है शहर की जैन साधार्मिक सेवा समिति ने। मकसद यही कि जीवन के इस पड़ाव में वे कभी खुद को अकेला समझें।
ऐसे मामले सामने आने लगे तो बाड़मेर शहर निवासी भंवरलाल पड़ाईया और उनके मित्र बालोतरा निवासी मांगीलाल गोलेछा ने ऐसे लोगों की सेवा के लिए संस्था बनाने का फैसला किया। उन्होंने 26 जनवरी, 2014 को जैन साधार्मिक सेवा समिति नामक संस्था का गठन किया। भंवरलाल पड़ाईया बताते है कि इसकी शुरुआत ऐसे लोगों को भोजन पहुंचाने को लेकर की गई। पहले दिन पांच लोगों की तलाश कर उनके यहां खाने का टिफिन लेकर पहुंचे ये वे बुजुर्ग लोग थे जो घर में अकेले थे और दो वक्त का भोजन बनाकर खाने में असहाय थे। कहते हैं कि उम्र के साथ स्वाभिमान भी बढ़ जाता है तो ये बुजुर्ग किसी के सहारे से भोजन करने को तैयार हुए। ऐसे में तय किया गया कि दस रुपए प्रति टिफिन लिया जाए। आज एक साल में सेवा समिति की ओर से प्रतिदिन दोनों समय ऐसे 60-65 बुजुर्ग लोगों तक खाना पहुंचाया जा रहा है।
... लोग जुड़ते गए
72वर्षीय पड़ाईया बताते है कि इस काम के लिए वे अकेले ही चले थे, लेकिन उद्देश्य ठीक था तो लोग जुड़ते गए और कारवां बढ़ता गया। आज इस समिति में 26 लोग शामिल हैं। संस्था के संचालन के लिए कुछ लोगों को पदीय जिम्मेदारी भी दी गई है, जिसमें रतनजी वडेरा अध्यक्ष हैं।
बुजुर्गों की जरूरत का ख्याल
पड़ाईयाबताते हैं कि अगर किसी बुजुर्ग को खिचड़ी की जरूरत है या दाल चावल की तो उसके लिए वही भोजन तैयार होकर जाता है और किसी अन्य को रोटी सब्जी की चाहत या कुछ और है तो उसको भी पूरा किया जाता है।
जबआंखें नम हो गई
रतनवडेरा बताते है कि एक समय के भोजन खर्च 2500 रुपए आता है। इच्छुक व्यक्ति एक समय को भोजन स्पोंसर कर सकता है। यह सहयोग केवल प्रत्येक माह की 26 तारीख और पूर्णिमा को ही लेते हैं।
सात्विकभोजन,उच्च विचार
संस्थासे जुड़े डॉ. बी.डी. तातेड़ बताते हैं कि जैन परिवार के बुजुर्गों के लिए भोजन में पूरी तरह से सात्विकता बरती जाती है। साथ ही बुजुर्गों की सेहत का ध्यान रखा जाता है, यानी मसाला, शुद्ध देसी घी नमक आदि। खाने पर आने वाली लागत संस्था से जुड़े 26 सदस्य मिलकर उठाते हैं। संस्था से जुड़े मांगीलाल गुलेछा का कहना है कि इस पहल का सबसे अधिक यह फायदा यह है कि सुसंस्कृत और सुदृढ़ समाज का निर्माण हो रहा है।
बाड़मेर. बुजुर्गों के लिए साइकिल से टिफिन ले जाते संस्था के कर्मचारी
बाड़मेर. संस्था पदाधिकारी बाएं से मांगीलाल गोलेछा, भंवर लाल पड़ाईया, डा बीडी तांतेड़, रतन वड़ेरा और गाैतम संखलेचा