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दंपति ही गृहस्थ जीवन की संपति : विमलसागर
कुंवारायुवक किसी महिला से घनिष्ठता बढ़ाए तो आपत्ति है। कुंवारी कन्या कहीं अकेली जाए तो विपत्ति है। परिवार की सहमति से दोनों पाणिग्रहण कर ले तो वे दंपत्ति है। दंपत्ति ही गृहस्थ जीवन की संपत्ति है। भारतीय संस्कृति में विवाह पौराणिक काल से सदाचार के रक्षण की सर्वश्रेष्ठ एकमात्र व्यवस्था है। विवाह का यह पवित्र गठबंधन ही परिवार और समाज की बुनियाद है। विवाह बिना का मानवीय समाज पथभ्रष्ट, अराजक और दुखदायी ही हो सकता है। इसीलिए भगवान महावीर ने साधु कर्म की व्यवस्था के साथ गृहस्थ धर्म की अलग से निरूपणा की। ये समसामयिक क्रांतिकारी सामाजिक विचार राष्ट्रसंत जैनाचार्य पदमसागरसूरीश्वर महाराज के शिष्य प्रवचनकार मुनि विमलसागर महाराज ने लूणी नदी के तट पर भगवान महावीर गौशाला प्रांगण में शुक्रवार को व्यक्त किए।
दंपत्ति शिविर में 450 से अधिक युवा दंपत्तियों को संबोधित करते हुए मनस्वी मुनि ने दांपत्य जीवन से संबंधित अनेक विषयों की हृदयस्पर्शी विवेचना की। शहर में अपने आप में यह विरल अनूठा आयोजन था। इससे पहले महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश राजस्थान में मुनि विमलसागर महाराज अनेक दंपत्ति शिविरों का सफल आयोजन कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि संसार एक संग्राम है। अच्छी सोच-समझ के साथ रास्ता बनाकर ही इस संग्राम को सफलतापूर्वक जीता जा सकता है। विवाह को भारतीय संस्कृति में पाणिग्रहण कहा जाता है। जो छोटी-बड़ी बातों को लेकर तलाक लेते हैं या लेने का सोचते है। वे सब भरोसा करने लायक सामाजिक अपराधी है। विवाह के बाद तलाक पारिवारिक और सामाजिक परंपराओं के लिए घातक है। समाज के समझदार लोगों को आगे आकर इस पागलपन को राेकने का प्रय| करना चाहिए।
मुनि विमलसागर महाराज ने कहा कि महिलाओं को पेट का पक्का बनना चाहिए। सासु-बहु को अपने आपसी विवादों में पुरुष को सैंडविच नहीं बनाना चाहिए। जहां प|ी के साथ तालमेल नहीं होता अथवा जहां सासु-बहु के विवाद ज्यादा होते हैं। उस घर के पुरुष घर से ज्यादा बाहर रहना पसंद करते हैं और ऐसे पुरुषों के पथ से भटक जाने की भी पूरी संभावना रहती है। पुरुषों को भी चाहिए कि वे महिलाओं को समुचित सम्मान दें। माता-पिता की गालियां देकर या बार-बार घर से निकल जाने का कह कर महिला को घायल करें। जहां सदाचारी या नीतिमान महिलाओं का अपमान होता हैं, उस घर से दैविक शक्तियां विदा हो जाती है और वहां दुख-दरि