कुल्हाड़ी थमने से आबाद हुआ जंगल
िवजय यादव/ ओमप्रकाश शर्मा | अलवर/ सरिस्का
केवलचार साल पहले जहां पेड़ों के नाम पर कुछ ठूंठ और झाड़ियां बची थी, वहां अब 100 वर्ग किलोमीटर का हराभरा जंगल लहलहा रहा है। बानसूर के पास रामपुर जंगल में ग्रामीणों की पहल ने रंगत बदल दी है। कुल्हाड़ियां और आरियां चलनी बंद हो गई और पेड़ों की कटाई रुक गई। पहले इस इलाके में रहने वाले ग्रामीण ही पेड़ों की अवैध कटाई करते थे। कटाई से तौबा करने के बाद अब ग्रामीणों के जीवन में भी बदलाव आया है। बच्चे स्कूल जाने लगे हैं। घरों में लकड़ियों के चूल्हे की जगह रसोई गैस ने ले ली है। हरियाली का यह आमंत्रण देख सरिस्का की बाघिन एसटी-10 ने भी शावकों के साथ यहां ठिकाना बना लिया है। प्रदेश की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत रामपुर के जंगल में एक दशक पहले वनों की कटाई का सिलसिला शुरू हुआ। सरिस्का में कोर एरिया के इस जंगल में शुरू में तो कुछ ही लोग पेड़ों की कटाई करते थे, लेकिन कटाई से कमाई देखकर बड़ी संख्या में ग्रामीण इस अवैध काम में जुट गए। जंगल साफ होने लगा। दिन-रात पेड़ों पर चली कुल्हाड़ियों और लकड़ियां ढोने में लगी गाड़ियों के शोरगुल से वन्यजीव यह इलाका छोड़ गए। रिहायशी इलाके के आसपास का जंगल खत्म हुआ तो कटाई करने वालों ने जंगल का भीतरी भाग में भी पेड़ों का सफाया कर दिया। सरिस्का प्रबंधन जब तक चेता, रामपुर का जंगल विनाश के कगार पर था। 2009 आते-आते जंगल में कालाखैर, धौंक, सालर जैसे पेड़ों की जगह ठूंठ और झाड़ियां ही बची थीं। जंगल बचाने के लिए वन विभाग ने सख्ती दिखाई तो ग्रामीणों वनकर्मियों में टकराव शुरू हो गया। दोनों पक्षों में आएदिन मारपीट होने लगी। वन विभाग मुकदमे दर्ज कर रहा था, लेकिन कटाई नहीं थम रही थी।
ऐसी स्थिति में वन अधिकारियों ने टकराव छोड़कर नई रणनीति अपनाई। ग्रामीणों के साथ बैठकों के दौर शुरू किए। यह नीति कारगर साबित हुई। समझाइश का असर हुआ और धीरे-धीरे ग्रामीणों ने कुल्हाड़ी छोड़ दी। ऐसा भी समय आया कि ग्रामीणों ने जंगल में कुल्हाड़ी नहीं ले जाने का प्रण लिया। इतना ही नहीं, कटाई करने वालों के खिलाफ वन विभाग से कार्रवाई कराई। कटाई करने वालों को पेड़ों का रक्षक बनाने के इस काम में रामपुर ग्राम पंचायत के मौजूदा सरपंच रामोतार मीणा, वन विभाग के अधिकारी आरएस शेखावत, केके गर्ग मुकेश सैनी आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
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