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शशिकपूर के नैराश्य का कारण क्या है?

7 वर्ष पहले
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शशिकपूर मुंबई के अस्पताल में फेफड़ों के रोग से जूझ रहे हैं। विगत दो वर्षों से किडनी रोग के कारण वे सप्ताह में दो बार डायलिसिस कराते हैं। उनके बड़े भाई शम्मीकपूर ने डायलिसिस की सहायता से बारह वर्ष निकाले आैर मृत्यु का कारण किडनी रोग नहीं, कोई आैर रोग था। शम्मीकपूर सप्ताह में तीन बार डायलिसिस कराते थे। उनकी आैर छोटे भाई शशिकपूर की बीमारियां लगभग समान हैं परंतु बीमारी के समय दोनों के दृष्टिकोण में अंतर है। शम्मीकपूर का कहना था कि सप्ताह में तीन दिन अस्पताल में काटने के बाद बचे हुए चार दिनों में वे दबंग ढंग का जीवन जीते थे। उन्हें कार चलाने का शौक था आैर पैर निर्बल थे तो उन्होंने हाथों से नियंत्रित करने वाली एक विशेष कार आयात की थी। उनके सकारात्मक दृष्टिकोण के कारण उन्होंने अपनी बीमारी के दर्द के दंश को भोथरा बना दिया आैर तीमारदारी करने वाले परिजनों को भी यातना से बचा लिया।

शशिकपूर का दृष्टिकोण ही उनके कष्ट को बढ़ा रहा है। विगत कई वर्षों से उन्होंने अपने निकट के लोगों से भी मिलना-जुलना बंद कर दिया है। वे अपने में सिमट कर रह गए हैं। उन्हें यश चोपड़ा ने ‘वीर जारा’ में उस भूमिका का प्रस्ताव दिया था जो अमिताभ बच्चन ने निभाई है। दरअसल यश चोपड़ा अमिताभ बच्चन को शशिकपूर से बेहतर अभिनेता मानते हैं परंतु उन्होंने यह भूमिका पुराने मित्र को अपने आेढ़े हुए नैराश्य से उबारने के लिए देनी चाही थी। अमिताभ बच्चन भी अनेक बीमारियों को झेलते हुए निरंतर काम कर रहे हैं। यह जुझारूपन आैर जीवट बने रहना पूरे जीवन के विचार का परिणाम है।

आखिर शशिकपूर काे वह कौन सा दु:ख है कि उन्होंने वर्षों पूर्व ही हथियार डाल दिए? अगर ‘अजूबा’ असफल रही तो वह भी उनका अपना विषय चयन था। शशिकपूर ने बतौर निर्माता सार्थक फिल्में बनाई जैसे जुनून, कलयुग, विजेता, 36 चौरंगी लेन आैर उत्सव तथा इन सार्थक फिल्मों की असफलता से यह गलत नतीजा निकाला कि फूहड़ फिल्में चलती हैं। प्रतिक्रिया स्वरूप लिए निर्णय ऐसे ही होते हैं। ‘अजूबा’ की असफलता के कारण हुए घाटे उन्होंने एक बहुमंजिला बनाकर चुकता कर दिए। ‘उत्सव’ के प्रदर्शन के समय उनकी प|ी का निधन हुआ था। उस तरह के विरह अनेक लोगों को सहने पड़ते हैं। क्या शशिकपूर पर यह दबाव था कि उनके दोनों भाई उनसे अधिक सफल हैं? यह भी संभव नहीं है क्योंकि बतौर सितारा उन्होंने लंबी पारी खेली आैर पृ