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एंबुलेंस नहीं आई, 12 घंटे तक वार्ड में पड़ा रहा सहरिया बालक का शव

5 वर्ष पहले
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कोटा/बारां|न्यू मेडिकलकॉलेज अस्पताल के शिशु वार्ड में रविवार की रात एक 10 साल के सहरिया बालक की मौत हो गई। पूरी रात शव इसलिए वार्ड में पड़ा रहा, क्योंकि परिजनों के पास एंबुलेंस के पैसों की व्यवस्था नहीं थी। सुबह एक परिचित एंबुलेंस चालक ने शव को गांव पहुंचाया।

पूरे मामले में अधीक्षक यही कहते रहे कि शव के लिए एंबुलेंस भेजने का कहीं कोई प्रावधान नहीं है। मांगरोल के वार्ड-15 का रहने वाला केसरीलाल सहरिया अपने 10 वर्षीय बालक रघुवीर को दो दिन पहले बारां से रैफर कराकर कोटा नए अस्पताल में लाया था। बच्चे के सभी अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। दोनों किडनी भी काम नहीं कर रही थी। डॉक्टरों ने उसका डायलिसिस भी कराना चाहा, लेकिन नेफ्रोलॉजी विभाग ने साफ कह दिया कि बच्चा ऐसी स्थिति में नहीं है कि उसका डायलिसिस किया जा सके। आखिरकार रविवार रात करीब साढ़े 9 बजे रघुवीर की मौत हो गई। परिजनों के पास पैसे नहीं थे तो उन्होंने वार्ड में मौजूद स्टाफ डॉक्टरों से एंबुलेंस के लिए बात की, लेकिन कोई व्यवस्था नहीं हो पाई। आखिरकार सुबह करीब 9 बजे उसके गांव के पास बंबोरी का रहने वाला एक एंबुलेंस वाला मिला, जिसने इंसानियत के नाते शव को गांव पहुंचाया।

नियमोंमें नहीं, कैसे भेज देते : अधीक्षक

इसबारे में शिशु रोग विभाग के हैड डॉ. ए. एल. बैरवा ने बताया कि बच्चा शुरू से ही सीरियस था। उसे जयपुर रैफर कर रहे थे, लेकिन पिता ने ले जाने से मना कर दिया। वह मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर का शिकार था। अधीक्षक डॉ. एसआर मीणा ने कहा कि अस्पताल में संविदा पर एक एंबुलेंस हैं। शव के लिए एंबुलेंस भेजने का कोई प्रावधान नहीं है। यदि मानवता के नाते एंबुलेंस भेज भी दें और पीछे से दूसरी कोई इमरजेंसी जाए तो उसके लिए कहां से व्यवस्था करते। गौरतलब है कि पिछले सप्ताह जेकेलोन अस्पताल में भी ऐसा ही मामला सामने आया था, उसमें भी एक सहरिया प्रसूता के नवजात की मौत हो गई थी और पूरी रात शव अस्पताल के साइकिल स्टैंड पर रखा रहा था।

जवाबमांगते सवाल

{पूरेप्रदेश में जब बार-बार ऐसे मामले सामने रहे हैं तो आखिर सरकार ऐसी कोई गाइडलाइन क्यों नहीं बना देती, जिसके तहत गरीब तबके के लोगों के शवों को घरों तक पहुंचाने की व्यवस्था हो जाए?

{क्या इस तरह शवों का सिर्फ इसलिए पड़े रहना, क्योंकि उनके परिजनों के पास एंबुलेंस के पैसे नहीं होते, सिस्टम के मुंह पर तमाचा नहीं है? क्या सारी सरकारी योजनाएं ऐसे मामलों के आगे बौनी नजर नहीं आती?

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