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नेपाल के दल ने समझाए भूमि अिधकार आजीविका के साधन
नेपालके 12 संगठनों के 19 प्रतिनिधि पिछले एक सप्ताह से एकता परिषद् के जमीनी कार्यकर्ताओंं और मुखियाओं के साथ भूमि आधारित आजीविका के बीच जंगल एवं जमीन के लोगों को अधिकार पाने की जटिलताओं का अध्ययन कर रहे हैं। साथ ही सरकार के साथ मिलकर समस्याओं का समाधान कर वंचितों को अधिकार वापस दिलाने की मुहिम को सीख समझ रहे हैं।
रविवार को एक निजी होटल में हुई कार्यशाला में इन बिंदुओं पर मंथन किया गया। कार्यशाला का शुभारंभ दोपहर डेढ़ बजे हुआ। इसमें बताया गया कि बारां जिले में आज भी सहरिया आदिवासियों की जमीनों पर प्रभावशाली लोग कब्ज़ा कर खेती कर रहे हैंl सैकड़ों आदिवासियों के पास जमीन के अधिकार के मालिकाना हक की किताब तो है, लेकिन भौतिक कब्ज़ा अभी तक नहीं मिला हैl यह बात एकता परिषद् के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष रनसिंह परमार ने भूमि आधारित अर्थव्यवस्था के बारे में कहीं। राजस्थान के समन्वयक जयसिंह जादौन ने कहा कि भूमि के मुद्दों को हल करने के लिए सरकार संवेदनशील नहीं है। भूमि के बिषय पर कंप्यूटर इंजीनियर रवि बद्रीनारायण ने कहा कि वे सहरिया आदिवासियों को न्याय पाने में देरी से काफी दुखी हैं। पिछले 4 महीने से गांव-गांव में जितना घूम रहे हंै उतनी समस्याओं का उनके सामने अंबार लग रहा है। मप्र एकता परिषद् के मनीष राजपूत ने कहा कि मप्र. की सरकार ने एकता परिषद् की पहल पर गरीबों की भूमि समस्याओं का त्वरित समाधान के टास्क फाॅर्स बनाए की पहल की है। राजस्थान से उप्र के बुंदेलखंड क्षेत्र तक फैले सहरिया आदिवासियों को उनके हक के लिए संगठित करने वाले राकेश भाई ने कहा कि पूरी सहरिया पट्टी में गरीबों के पास जीने का एक मात्र साधन केवल जमीन ही है लेकिन उसका अधिकार लोंगों को नहीं मिलl
इन्होंनेभी लिया कार्यशाला में भाग:इस विचारमंथन में नेपाल के 19 प्रतिनिधियों के साथ-साथ राजस्थान के ग्रामीण विकास ट्रस्ट के श्री शंभूसिंह, होदोतिय आदिम जनजाति के प्रतापलाल मीना, भारत ज्ञान विज्ञान बारां के हेमंत भार्गव, एकल नारी शक्ति संगठन की नंदकंवर विद्या बंसल, राजस्थान एकता परिषद् के समन्वयक जयसिंह ने भी भाग लिया। दक्षिण एशिया शांति संगठन के विजय भाई ने इस क्षेत्र में प्रकृतिक संसाधनों के अधिकारों को लेकर जो शक्ति संबंध बने हैं उन पर विचार रखे। एकता परिषद् के राष्ट्रीय जन वकालत प्रभारी अनिल गुप्ता ने प्रतिभागियों को प्