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राजनीतिक लड़ाई में पिस रही है बाड़मेर की डेढ़ लाख आबादी

6 वर्ष पहले
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बाड़मेर। जिस नगर परिषद बोर्ड पर डेढ़ लाख की आबादी वाले शहर में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार और विकास का जिम्मा हो वह राजनीति का अखाड़ा बन गया है। नया कार्य शुरू होना तो दूर की बात,एक भी समस्या का समाधान नहीं हुआ है। नगर परिषद के सभापति और आयुक्त में किस कदर ठनी हुई है इसकी बानगी गुरुवार को और दिखाई दी।
सभापति ने आयुक्त के खिलाफ शहर के पार्षदों कोे पत्र भेजकर कहा कि वे आयुक्त से पिछली बैठक का कार्यवाही विवरण जारी नहीं करने संबंधी मामले में जवाब मांगे। स्थानीय निकाय विभाग के निदेशक को भी आयुक्त के खिलाफ शिकायती पत्र भेजा है। इधर, शाम होते-होते आयुक्त ने सभी पार्षदों को कार्यवाही विवरण के साथ शुक्रवार और 18 फरवरी को होने वाली बैठक का पत्र भेज दिया। कुल मिलाकर शहर का विकास और समस्याओं का समाधान राजनीतिक लड़ाई की भेंट चढ़ गया है और जन प्रतिनिधि आैर अधिकारी खामोश बैठे है। इस खामोशी के कारण पूरा शहर समस्याओं से पिस रहा है।

सभापति लूणकरण बोथरा ने पार्षदों को भेजे पत्र में लिखा है कि नवगठित बोर्ड की प्रथम बैठक 19 जनवरी को हुई,लेकिन एक माह बाद भी बैठक का कार्यवाही विवरण जारी नहीं किया गया है। शुक्रवार को परिषद की बजट बैठक प्रस्तावित है,ऐसे में पहले की बैठक की कार्यवाही विवरण जारी किए बिना नई बैठक कैसे की जा सकती है? सभापति ने इस संबंध में आयुक्त लिपिकों से कई बार पूछा लेकिन आयुक्त ने कोई जवाब नहीं दिया।
बाेथरा ने आरोप लगाया कि इन गतिविधियों से स्पष्ट होता है कि आयुक्त की ओर से परिषद के कार्यो को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। इससे जनता और जन प्रतिनिधियों में आक्रोश है। सभापति ने पार्षदों को सुझाव दिया है कि आगामी बैठक में आयुक्त से इस बारे में जवाब मांगे कि अब तक पूर्व बैठक का कार्यवाही विवरण तैयार कर सभी पार्षदों को क्यों नहीं दिया गया है?

निदेशक को कहा शहर की हालत बिगड़ी हुई

सभापतिकी ओर से निदेशक को भेजे शिकायती पत्र में लिखा है कि शहर में परिषद की ओर से दी जाने वाली मूलभूत सुविधाओं सफाई, रोशनी इत्यादि की हालत बिगड़ी हुई है। अतिक्रमणकारियों के हौसले बढ़े हुए है। शहर का विकास अवरुद्ध हो रहा है जिससे जन प्रतिनिधियों जनता में आक्रोश व्याप्त है।

सभापति और आयुक्त के बीच लड़ाई के पीछे कई राजनीतिक मायने छिपे हुए है। निकाय चुनाव में शहर के बोर्ड पर कांग्रेस का कब्जा हो गया। राज्य में भाजपा की सरकार है। भाजपा के नुमाइंदे कांग्रेस बोर्ड को सफल होने देना नहीं चाहते। कांग्रेस का बोर्ड नहीं बने इसके लिए भी भाजपा ने ऐड़ी चोटी का जोर लगाया था।
जिले से इकलौते कांग्रेस के विधायक मेवाराम जैन ने भाजपा के अपने विरोधियों को पटकनी देते हुए बोर्ड पर कब्जा कर लिया। यहां से कांग्रेस और भाजपा के बीच लड़ाई शुरू हो गई। सभापति लूणकरण बोथरा के कार्यग्रहण करने के बाद आयुक्त धर्मपालसिंह ने राजनीतिक दबाव में परिषद के कार्यों में रुचि लेनी बंद कर दी।
दोनों के बीच चल रही तनातनी गुरुवार को चरम पर पहुंची। सभापति ने पार्षदों का सहारा लिया तो आयुक्त ने भी वापस पत्र का जवाब पत्र से दिया। इस पूरी लड़ाई में सबसे ज्यादा नुकसान शहर की डेढ़ लाख की आबादी को हो रहा है।