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माता पिता बच्चों को कार से पहले संस्कार दें : ललितप्रभ

6 वर्ष पहले
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आजकार से पहले संस्कार की जरूरत है। संस्कार की कमी के चलते ही समाज और खासकर युवाओं में विकृतियां पैदा हो रही है। परिवार के साथ साथ संतों का यह दायित्व है कि वे बच्चों और युवाओं को समझाएं कि पूजा-पाठ, तीर्थ यात्रा से बड़ा धर्म संस्कार है। आज का दौर भौतिकवाद से ज्यादा सुधारवाद का युग है।

यह बात जैन संत ललितप्रभ ने बाड़मेर प्रवास के दौरान विशेष बातचीत में कही। समाज सुधार में संत की भूमिका पर उन्होंने कहा कि आंशिक कमियां तो सभी में हैं पर किसी पर दोषारोपण की बजाए आत्मचिंतन करना होगा कि अपनी पुरातन संस्कृति को कैसे जीवित रखें। अच्छे संस्कार की जरूरत केवल भारतवासियों को, बल्कि संपूर्ण विश्व को है। संस्कार में गिरावट लाकर कोई भी देश अपनी संस्कृति को जीवित नहीं रख सकता। हम व्यसन मुक्त रहें। सत्य और शीलवान रहें। प्रेम और भाईचारा बढ़ाएं। परस्पर काम आएं।

मुनि ने कहा हर युग में बुराइयां रहीं हैं। इन बुराइयों को दूर करने के लिए राम, कृष्ण और महावीर ने अवतार लिया, लेकिन अब अपने भीतर के राम, कृष्ण और महावीर को जगाना चाहिए। एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने माना कि दो प्रतिशत संतों में भी विकृतियां आई हैं। संत भी स्वयं को सुधारें। घटते संस्कारों पर चिंता जाहिर करते हुए ललितप्रभ ने कहा यही स्थिति रही तो 20-25 साल बाद गली गली में वृद्धाश्रम खुल जाएंगे।

उन्होंने कहा कि जैसी जड़ होगी, फल वैसा ही होगा। बबूल बोकर उसपर आम लगने की बात सोचना क्या सही है। संत मुनि ने कहा समाज के अंशमात्र लोग जिस तरह शादी विवाह या अन्य आयोजनों में करोड़ों अरबों रुपए खर्च करते हैं क्या वह सही है। इससे समाज में कहीं कहीं विकृति पैदा होती है। उन्हें चाहिए कि वे इन पैसों का सामाजिक कार्यों में खर्च कर समाज का उद्धार करें। ललितप्रभ ने एक अन्य सवाल के जवाब में कहा कि किसी भूखे को भोजन कराना, ईश्वर पर रुपए पैसे अर्पण करने से बेहतर है।

आज का युवा धर्म से ज्यादा जुड़ रहा है। उसका धर्म की ओर रुझान बढ़ रहा है, लेकिन जरूरत इस बात की है कि उसके भटके कदमों को सही दिशा दी जाए। आज के युवा सुबह मंदिर जाते हैं। उपवास रखते हैं, लेकिन शाम होते-होते उनके कदम दूसरी ओर चले जाते हैं। इन कदमों को साधने की जरूरत है। धर्म को जितना सरल बनाया जाएगा। युवा इसकी ओर उतना ही आकर्षित होगा। इसलिए धर्म को सरल और सुगम बनाने की जरूरत है। धर्म के व्यवसायीकरण के सवाल पर ललितप्रभ ने कहा कि सभी संत ऐसे नहीं हैं, जो धर्म को व्यापार की तरह करें। हां कुछ संत ऐसे हैं, जो धर्म को भी भौतिक चकाचौंध की तरह दिखाते हैं। वे संत नहीं हैं। संत सौम्य और सरल होता है। संत व्यापार नहीं व्यवहार करते हैं। संत शब्दों ने नहीं आचरण से बोलते हैं।