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33 रुपए में कहां से लाएं पोषाहार पकाने वाले
सरकारीप्राइमरी मिडिल स्कूलों में 33 रुपए रोज में पोषाहार पकाने वालों की व्यवस्था संस्था प्रधानों के लिए चुनौती बन गई है। पोषाहार के लिए जहां हर साल बजट बढ़ता है वहीं पोषाहार पकाने वाली महिलाओं का मानदेय पांच साल में एक बार भी नहीं बढ़ा है। स्कूलों में पोषाहार सामग्री साफ करना, पकाना, बच्चों को परोसना, बर्तनों की सफाई तथा रसोई की सफाई करना इत्यादि काम महिलाओं पर ही निर्भर है।
विद्यालय प्रबंधन समिति की मॉनीटरिंग में मिलने वाला मानदेय मंहगाई के दौर में कम पड़ रहा हैं। करीब पांच वर्ष पहले एक आदेश के बाद पोषाहार की जिम्मेदारी निभाने वाले कुक-कम-हैल्पर को 1 हजार रुपए फिक्स मानदेय दिया जा रहा है। इन कार्मिकों में महिलाओं की भूमिका सबसे ज्यादा हैं। भुगतान बढऩे की आस में काम कर महिलाओं की आस पर हर साल पानी फिरता जा रहा है।
^स्कूल में जाते 10 साल हो गए। पहले तो बच्चों के अनुसार पैसे मिलते थे, लेकिन महंगाई में एक हजार रुपए से काम नहीं चलेगा। कंकूदेवी, कुक-कम-हैल्पर,काबरा।
^महिला प्रोत्साहन को लेकर एक तरफ सरकार कई योजनाएं लागू कर रही है। एक हजार रुपए देकर महिलाओं की क्षमता से अधिक काम लिया जा रहा है। जो कि गलत है। सी.एन.शर्मा, जिलाध्यक्षभारतीय मजदूर संघ, ब्यावर।
ब्यावर. एकसरकारी स्कूल में मिड-डे-मिल के तहत पोषाहार लेते स्कूली विद्यार्थी।