नाग नहीं अजगर की होती है पूजा
मनीष शर्मा/नितिन कुमार शर्मा| ब्यावर
देशमें कई जगह जानवरों को भले ही विभिन्न देव स्वरूप में पूजा जाता हो। लेकिन ब्यावर के सेंदड़ा रोड तिराहे पर स्थित अजगर बाबा का थान एक मात्र ऐसा धार्मिक स्थल हैं जहां अजगर को देवता मान कर सालों से पूजा जा रहा है।
आजादी से पहले 1946 के जमाने में अजगर के प्रति लोगों के मन में जगी आस्था श्रद्धा आज भी बरकरार है। 68 साल पहले सर्कस के माध्यम से ब्यावर की धरा पर आया ‘त्रिशुल तिलकधारी सर्पवंश’ आज भी ‘अजगर बाबा’ के रूप महत्वपूर्ण पारंपरिक लोक देव की तर्ज पर धार्मिक मान्यता के साथ यह अजगर बाबा का प्राचीन थान प्रदेश के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
पुजारी शेषमल के मुताबिक किसी भी जहरीले सांप ने काटा हो या सालों से मां की कोख सूनी पड़ी हों। सच्चे मन से बाबा के दरबार में आने वालों की समस्याओं का निदान जरूर हो जाता है। लेकिन इसके साथ यह शर्त भी मानी जाती हैं कि दरबार में आने वालों के मन में किसी भी प्रकार का झूठ, कपट और राग-द्वेष नहीं होना चाहिए। लोगों में ऐसी भी मान्यता है कि इस प्राचीन थान पर त्रिशूल तिलकधारी केसरिया रंग के शेषनाग का वंशज अजगर स्वरूप में दफन है। लोक संस्कृति में सर्पवंश को देवता के रूप में पूजने और भाद्रपद मास में लोक देवताओं से जुड़े लोक मेलों का महत्व बढ़ने के चलते भादवा सुदी छठ के दिन थान पर बड़ी आस्था श्रद्धा के साथ अजगर बाबा का जागरण समारोहपूर्वक आयोजित किया जाता है। अजगर बाबा की कृपा से जीवन में समस्याओं से छुटकारा पाने की कामना लिए लोगों द्वारा बड़ी तादाद में नारियल, अगरबत्ती चढ़ाकर आस्था के साथ मनोकामना की जाती है। 68 साल पहले शुरू हुए इस आस्था श्रद्धा के सिलसिले ने आज बड़े मेले का रूप ले रखा है।
अजगरकी पूजा
अजगरबाबा के थान से जुड़े धार्मिक लोगों का दावा है कि देश में नाग देवता के रूप में सर्प का पूजन कई जगह पर होता होगा लेकिन अजगर को देवता मान कर अजगर बाबा के रूप में ब्यावर के अलावा और कहीं भी नहीं पूजा जाता। सबसे आश्चर्यजनक बात ये है कि इस स्थान पर किसी देवी या देवता की और कोई मूर्ति नहीं है और ही अजगर की किसी के वाहन के स्वरूप में पूजा जाता है। मंदिर में अजगर की मूर्ति ही देवता के रूप में विद्यमान है। संपूर्ण भारत वर्ष में यही एक मात्र बाबा अजगर का मंदिर बताया जाता है।
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