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कल्याण के लिए धर्मरूपी रथ में बैठें: निर्मलमुनि

7 वर्ष पहले
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आत्मकल्याणके लिए प्रमाद को त्यागकर धर्मरूपी रथ में बैठ जाएं। परमात्मा की वाणी को आचरण में लाने से जीवन मे परिवर्तन आएगा। एकचित्त आत्म ध्यान की सामयिक साधना से परमात्मा की झलक मिलती है, जिससे व्यक्ति संचित कर्म बंधनों को काटते हुए संसार के भवसागर को पार कर जाता है।

यह विचार उपप्रवर्तक निर्मलमुनि ने मीरानगर जैन स्थानक में व्यक्त किए। इससे पूर्व श्रमण मुनि ने कहा जीवन में धर्म का दीया जलाने पर कषाय विषयों का अंधकार मिट जाएगा। साधना के सामने कर्म की कोई ताकत नहीं। कर्मों को भोगना ही पड़ेगा, यह व्याख्या गलत है। साधना करोगे तो कर्मों को भोगना आवश्यक नहीं। धर्म के लिए नहीं अपितु अधर्म के लिए पुरुषार्थ करना पड़ता है। पांच महाव्रत अहिंसा, अचौर्य, अपरिग्रह, सत्य ब्रह्मचर्य के पालन में संयम चाहिए। जबकि इसके विपरीत हिंसा, चोरी, परिग्रह, झूठ आदि विषयों में पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। कमजोर से कमजोर व्यक्ति संयम से धर्म के मार्ग पर चल सकता है। संघ मंत्री डॉ. रतनलाल मारू ने बताया कि निर्मल मुनि आदि ठाणा सोमवार सुबह विहार कर महावीर कॉलोनी स्थित नानू स्मृति भवन पहुंचेंगे जहां सुबह नौ बजे प्रवचन होंगे।

व्यक्ति को बाल अज्ञानी की संगति से बचना चाहिए। वह वीर प्रशंसनीय है, जिसने ज्ञान द्वारा अपनी आत्मा को संसार से मुक्त कर लिया है। क्योंकि ज्ञान से वास्तविक बोध संभव है। ज्ञान आत्मा की महान शक्ति है, ज्ञान निर्मल ज्योति है अखंड प्रकाश पुंज है।

यह विचार खातर महल में शासन दीपक अक्षय मुनि ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहे। उन्होंने कहा कि संसार में काेई किसी को तराने में सक्षम नहीं है। तिरना है तो गुरू का सहारा लेकर आत्मा स्वयं के पुरुषार्थ द्वारा कर्म पुदगलों को नष्ट कर अपने निर्मल स्वरूप को प्रकट कर सकता है। गृहस्थ धर्म को समझना भी आवश्यक है। जीवन में त्याग, संतोष, सहयोग, सहनशीलता एवं समन्वय से परिवार में सुख शांति होगी।

अत: धर्म के पथ पर चल कर जप-तप संयम से आत्मा को निर्मल बनाएं। धर्म जीवन को कुर्बान करना है, तप द्वारा दुखों के दावानल को समाप्त करें। तप द्वारा भव के बंधन क्षय कर सकते हैं। संचालन संघ महामंत्री शांतिलाल जारोली ने किया।

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