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दृष्टिहीन सुशीला ने साबित किया बेटियां बोझ नहीं, गौरव हंै

5 वर्ष पहले
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भादरा। सुशीला के पिता सरजीत सिंह थोरी ने अपनी दृष्टिहीन बेटी का बचपन में काफी इलाज करवाया। बाद में लेजर ऑपरेशन करवाकर आंखों में लैंस भी लगवाए गए पर कोई फायदा नहीं हुआ। डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया। सरजीत और उसकी पत्नी सुमित्रा अब सुशीला को लेकर पूरी तरह निराश हो चुके थे। उनका मानना था कि लड़का होता तो जैसे-तैसे काम चल जाता परंतु लड़की और वो भी दृष्टिहीन।
सूरतपुरा गांव की सुशीला अब मां-बाप को बोझ सा नजर आने लगी परंतु सुशीला ने दसवीं में 88.83 प्रतिशत अंक हासिल किए। शुक्रवार को कलेक्टर ने हनुमानगढ़ में आयोजित एक समारोह में सुशीला को इंदिरा प्रियदर्शनी पुरस्कार दिया। इस अवार्ड के तहत सुशीला को शीघ्र ही एक लाख रुपए मिलेंगे जो जल्द की उसके बैंक खाते में जाएंगे। इस एक लाख से उसे उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।
सुशीला ने यह साबित कर दिया कि वह दृष्टिहीन जरूर है परंतु किसी पर बोझ नहीं है। यही नहीं 15 अगस्त पर उसे जिला स्तर पर सम्मानित किया गया। गांव के लोगों ने भी उसे पुरस्कार स्वरूप करीब 50 हजार रुपए दिए और अब इंदिरा प्रियदर्शनी पुरस्कार लेकर उसने केवल उसका बल्कि पूरे गांव अपने स्कूल का नाम पूरे प्रदेश मे रोशन किया है। आखिर पिता ने कहा बेटियां हमारा गौरव है।
शुरू में कई कठिनाइयां आई, बहन पढ़कर सुनाती तो सब याद होने लगा
सुशीला जन्म से ही देख नहीं सकती, उसके पास 77 प्रतिशत दृष्टिहीनता का जिला मेडिकल बोर्ड का सर्टिफिकेट भी है। बचपन में उसने अपनी बहन समेस्ता के साथ गांव के ही सरकारी स्कूल जाना शुरू किया। देख नहीं पाने के कारण उसे शुरू में शिक्षा के संबंध में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा परंतु धीरे-धीरे वह स्कूल में पढ़ाई जाने वाली बातें सुनती और फिर घर पर आकर स्कूल में पढ़ाई हुई सभी चीजें मन ही मन में दोहराती। बहन समेस्ता उसे किताब के पाठ सुनाती। कुछ भी सुनकर उसे लंबे समय तक याद रखने की उसकी क्षमता बढ़ती गई। आठवीं में सुशीला 82 प्रतिशत अंकों से पास हुई, 9वीं में उसे 90 प्रतिशत अंक मिले, इसके बाद उसका आत्मविश्वास बढ़ता गया और उसने दसवीं में 90 प्रतिशत से अधिक अंक लाने की ठानी। दसवीं में उसे जिला या राज्य वरीयता सूची में स्थान तो नहीं मिला परंतु एक दृष्टिहीन बच्ची के लिए 89 प्रतिशत अंक लाना एक गौरव की बात थी।
दृढ़ इच्छा शक्ति से सब कुछ संभव : सुशीला
16वर्षीय सुशीला का मानना है कि दृढ़ इच्छा शक्ति और मेहनत के साथ सब कुछ संभव है। सुशीला ने यह कामयाबी सुरतपुरा गांव के राजकीय माध्यमिक स्कूल में पढ़कर हासिल की। सुशीला ने समाज के निशक्त लोगों से अपील की है कि वे अपने आपको असहाय समझे बल्कि अपना लक्ष्य तय करें और फिर जी-जान से अपने लक्ष्य को पाने के लिए मेहनत करें सफलता निशक्तता के आगे घुटने टेक देगी।
डीएवी उपलब्ध करवा रहा है निशुल्क शिक्षा
जब सुशीला ने पिछले वर्ष दसवीं कक्षा में 88.83 प्रतिशत अंक प्राप्त कर बड़ी सफलता हासिल की तो भादरा के डीएवी उमावि की प्रबंध समिति ने 12वीं तक सुशीला को निशुल्क शिक्षा देने का संकल्प लिया। इतना ही नहीं डीएवी स्कूल की प्रबंध समिति सुशीला को सुरतपुरा गांव से भादरा तक लाने-ले जाने का वैन किराया भी नि:शुल्क कर दिया है। सुशीला अब 11वीं कक्षा में डीएवी स्कूल में विज्ञान संकाय में पढ़ रही है।
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