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मोलेला में मृण कला सीखा रहे विदेशी

Dainik Bhaskar

Nov 19, 2015, 02:35 AM IST

Bhim News - एकढलती शाम को स्वीडन के कैनेथ विलियम्स मस्ती के मूड में बैठे गिटार बजा रहे थे। तभी उनके 25 साल पुराने हमवतन शिष्य और...

मोलेला में मृण कला सीखा रहे विदेशी
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एकढलती शाम को स्वीडन के कैनेथ विलियम्स मस्ती के मूड में बैठे गिटार बजा रहे थे। तभी उनके 25 साल पुराने हमवतन शिष्य और अब दोस्त बन चुके रेज फाल्हा का मोबाइल पर मैसेज आया। रेज ने उन्हें इंडिया में एक वर्कशॉप में हिस्सा लेने का आग्रह किया था। रेज मोलेला गोगुंदा की मिट्टी की कलाकारी के बारे में विलियम्स के सामने कई बार जिक्र कर चुके थे। फिर क्या था, विलियम्स ने हां कर दी।

रेज डॉ. गगनबिहारी दाधीच के आग्रह पर स्वीडन के मास्टर पोटर अभी मोलेला (खमनोर) में हैं। रेज बताते हैं कि 64 वर्षीय विलियम्स का आना यहां के कलाकारों के लिए बड़ा और दुर्लभ अवसर है। मोलेला की पारंपरिक कला और गोगुंदा की ब्लैक पोटरी के बारे में उन्हें बताया था, लेकिन कृतियां कैसे बनाई जाती हैँ, मिट्टी कैसी होती है, इसे वे लाइव देखना चाहते थे। यही आकर्षण उन्हें करीब 12 हजार किमी दूर यहां खींच लाया। स्टूडियो 25 टेराकोटा आर्ट में वे इन दिनों बड़ी शिद्दत से कलाकृतियां बनाने में मशगूल हैं। वे इंडियन आर्टिस्ट को भी पोटर बनाने के गुर सिखा रहे हैं। जूनियर आर्टिस्ट विलियम्स से कई सारे प्रश्न किए। हालांकि वे अभी छोटी कृतियां बना रहे हैं, लेकिन अगली बार आने पर भीमकाय कृतियां बनाने का वादा किया है।

इन्होंने बनाई कृतियां

बुधवारको इंग्लैंड की यार्का, जर्मनी के पीटर और नार्वे के एल्गा सहित पांच यूरोपियन विजिटर्स आर्टिस्ट ने शिरकत की। गोगुंदा के मृण पात्र (ब्लैक पोट टी) बनाने वाले प्रसिद्ध खीमराज काले रंग की मिट्टी साथ लेकर आए। इंटरनेशनल ब्रिनाले अवार्डी उदयपुर के अब्बास बाटलीवाला, डॉ. भूपेश कावडिय़ा, हेमंत द्विवेदी, एसएमबी कॉलेज की प्रोफेसर चित्रा भटनागर, स्टूडेंट पूजा शर्मा, रजनी जैन, कविता शर्मा, आयोजक डॉ. गगनबिहारी दाधीच, अहमदाबाद के प्रतीक, बूंदी के दिनेश वर्मा रितेश शर्मा, बनारस के अभिषेक पांडे, कोटा की शिक्षा गौतम ने भी कृतियां बनाई।

कई संग्रहालयों में है विलियम्स की कृतियां

विश्वभरके प्रसिद्ध सिरेमिक कृतियों के संग्रहालयों में विलियम्स के हाथों से बनी कृतियां मौजूद हैं। अमेरिका, कोरिया, जापान, आस्टे्रलिया, डेनमार्क, नार्वे, जर्मनी, फ्रांस, इटली सहित दुनियाभर के कई महाद्वीपों के शहरों में मास्टर पोटर की कृतियां प्रदर्शनी में लगी हैं। कैनेथ विलियम्स पहली बार भारत आए हैं। वे बताते हैं कि हर देश की अपनी परम्पराएं हैं। यूरोप में पारम्परिक रूप कलाएं खत्म हो चुकी हैं। कलाओं के नमूने सिर्फ संग्रहालयों में देखने को मिलते हैं, जबकि भारत में ऐसा नहीं है। यहां पग-पग पर हस्तशिल्प, लोक पारंपरिक कलाएं सदियों बाद आज भी जीवंत हैं।

कलाओं की निरंतरता किसी भी कलाकार के लिए प्रेरणा के स्त्रोत बनती है। यहां आने के बाद जो काम किया, उसमें भारतीयता का प्रभाव अपने आप गया। उन्होंने भारतीय कला प्रारूपों को यहां बनाई कृतियों में थोड़ा ही सही, लेकिन काम में लिया है। लकड़ी की चाक को हाथों से घूमाकर चलाने का अनुभव भी लिया।



लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाजा

विलियम्सनेशनल कॉलेज ऑफ आर्ट एंड डिजाइन, गोटन वर्ग में तीस साल तक प्रोफेसर रहे। स्वीडन सरकार ने 1992 में उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया। स्वीडन की राजशाही ने भी 2006 में अपने सबसे बड़े सम्मान से नवाजा। वहां की सरकार से उन्हें 30 हजार क्रोनर मासिक रकम ताउम्र मिलती रहेगी। इस आर्टिस्ट का मन निरंतर कुछ नया करने को बेताब रहता है।

14 साल की उम्र में शुरुआत, फिर बने मास्टर पोटर

स्वीडनके जिंक माइन में विलियम्स ने 14 साल की उम्र में मिट्टी के पोटर बनाने की शुरुआत की थी। 18 के होते-हाेते उनकी कृतियां नेशनल लेवल पर सराही जाने लगीं। पांच इंच से लेकर दस मीटर यानी तीस फीट तक की अद्भुत कलाकृतियां बनाईं और इसी तरह बनाते-बनाते वे मास्टर पोटर ऑफ स्वीडन बन गए। उन्होंने स्टोन वेयर, रेड क्ले, पोर्सलीन, राका फायर आदि से कलाकृतियां बनाईं।



खमनोर. स्थानीयकलाकारों को पोटर आर्ट के बारे में बताते विलियम्स।

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