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‘शराब के नशे से भी अधिक खतरनाक है धन का नशा’
महावीर स्वामी मंदिर में आयोजित सैंतालीस दिवसीय उपधान तप के बाइसवें दिन शनिवार को जैनमुनि जयर| विजय महाराज की सानिध्य में प्रवचन का आयोजन हुआ। इस अवसर पर जैनमुनि जयर| विजय महाराज ने कहा कि मानव जीवन में प्राप्त कुल, धन, शक्ति, बुद्धि आदि का घमंड नहीं करना चाहिए। उन्होंने आठ मदों के बारे में बताते हुए कहा कि मानव को जीवन में प्राप्त जाति, कुल, रूप, बल, लाभ, बुद्धि, कीर्ति श्रुत विद्या का अभिमान नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भाग्योदय से उत्तम जाति और ऊंचे कुल में जन्म हो, कामदेव के तुल्य सुंदर रुप, विशिष्ट शारीरिक बल, व्यापार आदि में धानादि का विशेष लाभ, औत्पातिकी आदि बुद्धि की प्राप्ति, लोक में कीर्ति तथा विशिष्ट ज्ञान प्राप्ति आदि हो जाने पर मद नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि उत्तम जाति, ऊंचे कुल तथा सूक्ष्म बुद्धि की प्राप्ति होने पर दूसरे का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। जैसे किसी कुरुप व्यक्ति को देखकर उसका मजाक करना, उसे चिढ़ाना, किसी कमजोर व्यक्ति को देखकर उसे गिरा देना। उन्होंने कहा कि जिस वस्तु का मानव अभिमान करता है, वही वस्तु उसके लिए दुर्लभ बन जाती है। ऐसे कई उदाहरण इतिहास के पन्नों पर पढ़ने-सुनने को मिलते है।
उन्होंने कहा कि मानव देह के सुंदर रुप का भी अभिमान करने जैसा नहीं है, क्योंकि यह सुंदर रुप भी क्षण विनश्वर है। उन्होंने कहा कि प्रकृति का नियम है कि मनुष्य जिस वस्तु का अभिमान करता है, भविष्य में वह वस्तु उससे दूर हो जाती है। यानि रुप का अभिमान करने वाला भविष्य में कुरुप बन जाता है। उन्होंने कहा कि धन की प्राप्ति भी पुण्योदय के अधीन है, पापोदय से धनवान व्यक्ति भी निर्धन बन जाता है। धन का नशा शराब के नशे से भी अधिक खतरनाक है। धन के नशे में चूर व्यक्ति बड़ों का भी अपमान करने में नहीं हिचकिचाता। उन्होंने कहा कि उम्र में बड़े व्यक्तियों का आदर-सम्मान करने की बजाय धनी-अभिमानी व्यक्ति बड़ों का अपमान करता है। अपमान के फलस्वरुप वह बड़ों के आशीर्वाद से वंचित रह जाता है।
भीनमाल. स्थानीयमहावीर स्वामी मंदिर में प्रवचन देते जैनमुनि और मौजूद लोग। भास्कर