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- \"आर्य संस्कृति में त्याग की अत्यधिक महत्ता\'
\"आर्य संस्कृति में त्याग की अत्यधिक महत्ता\'
महावीरस्वामी मंदिर में आयोजित सैंतालीस दिवसीय उपधान तप के सताइसवें दिन सोमवार को जैनमुनि जयर| विजय महाराज की सानिध्य में प्रवचन का आयोजन हुआ। इस अवसर पर जैनमुनि जयर| विजय महाराज ने कहा कि आर्य संस्कृति में लग्न संबंध जीवन पर्यंत संबंध है। उन्होंने कहा कि ब्रह्मचर्य के आदर्श को जीवंत रखकर सदाचारमय जीवन जीने के लिए ही मार्गांतु सरिता का दूसरा गुण सद्गृहस्थता पुनीत दांपत्य बतलाया गया है।
उन्होंने कहा कि मोक्ष प्रधान आर्य संस्कृति में त्याग की अत्यधिक महत्ता है। पूर्वकालीन महर्षियों ने ब्रह्मचर्य पालन का ही आदेश दिया है, क्योंकि ब्रह्मचर्य पालन से ही आत्मसिद्धि संभव है। उन्होंने कहा कि योग के त्याग के बिना अध्यात्म साधना में एकाग्रता भी संभव नहीं है। परंतु संपूर्णतया योग के त्याग की शक्ति हो और इंद्रियों को वश में रखना अशक्य हो, ऐसी परिस्थिति में मर्यादित जीवन जीने के लिए इस त्याग प्रधान संस्कृति में ‘पुनीत दांपत्य जीवन’ का निर्देश दिया गया है। जैनमुनि ने कहा कि अनार्य देशों की भांति जीवन संबंधों को तोड़ देना, आर्य संस्कृति को मान्य नहीं। लग्न जीवन मात्र दो व्यक्तियों नहीं, बल्कि दो कुटुंबों का विस्तृत संबंध होता है। इसलिए जीवन साथी की पसंदगी का आधार बाह्य रुप-रंग धन वैभव नहीं होना चाहिए। जो व्यक्ति मात्र बाह्य रुप से मोहित होकर लग्न व्यवहार करते है, अधिकांशत: बाद में उन्हें पछताना पड़ता है। उन्होंने कहा कि धन दौलत के लोभ में आकर जो व्यक्ति दीर्घ दर्शिता के बिना ही लग्न व्यवहार करते है, उनका लग्न जीवन रणस्थल बन जाता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में जैन समाज के लोग मौजूद थे।
मंदिर में प्रवचन देते जैनमुनि।
भीनमाल. स्थानीयमहावीर स्वामी मंदिर में प्रवचन सुनते श्रोता।