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‘परनिंदा करना दुर्जनता एवं परप्रशंसा करना सज्जनता का लक्षण है’

7 वर्ष पहले
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स्थानीयमहावीर स्वामी मंदिर में आयोजित सैंतालीस दिवसीय उपधान तप के इकतीसवें दिन शुक्रवार को जैनमुनि जयर| विजय महाराज की सानिध्य में प्रवचन का आयोजन हुआ। इस अवसर पर जैनमुनि जयर| विजय महाराज ने कहा कि गुणानुरागी आत्मा गुणवान व्यक्ति का बहुमान गुणहीनों की उपेक्षा करती है। वह गुणों के संग्रह में प्रवृत होती है और प्राप्त हुए गुणों को मलीन नहीं करती है। उन्होंने कहा कि गुणानुरागी व्यक्ति में हमेशा गुणदृष्टि होती है, उसकी दोष दृष्टि नष्टप्राय होती है। गुणदृष्टि वाले को सर्वत्र गुण नजर आते है, जबकि दोष दृष्टि वाले को सर्वत्र दोष ही नजर आते है। उन्होंने कहा कि दोष दृष्टि वाला व्यक्ति गुलाब के साथ कांटे, सागर के साथ खारापन चंद्र के साथ कलंक पर नजर रखता है, जबकि गुणदृष्टि वाला व्यक्ति गुलाब को ही देखता है, कांटे को नहीं। गुण दृष्टि वाले को सागर के खारेपन की बजाय उसमें समाए हुए र| नजर आएंगे, चंद्र को देखेगा तो उसकी उज्ज्वलता नजर आएगी, कलंक नहीं और सरोवर देखेगा तो उसमें खिला हुआ कमल दिखाई देगा, कीचड़ नहीं। जैनमुनि ने कहा कि गुणानुरागी गुण, गुणहीन को भी गुण समृद्ध बना देते है। गुणानुरागी व्यक्ति आत्म प्रशंसा और परनिंदा के पाप से सदा दूर रहता है। परनिंदा करना दुर्जनता एवं परप्रशंसा करना सज्जनता का लक्षण है। गुणानुरागी को सदा दान, शील, तप, स्वाध्याय और त्याग के प्रति प्रेम होता है। जैनमुनि आनंद विजय मसा ने धर्मश्रवण की महत्ता पर प्रकाश ड़ाला। इस अवसर पर बड़ी संख्या में जैन समाज के लोग मौजूद थे।

भीनमाल. महावीरस्वामी मंदिर में प्रवचन देते जैनमुनि और मौजूद लोग।