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12 डॉक्टरों पर 10 लाख बच्चों के उपचार का जिम्मा
पद सृजित हुए और अलग हॉस्पिटल का दर्जा मिला
जिलामुख्यालय स्थित शिशु अस्पताल के हालात भी दयनीय हैं। यहां तो डॉक्टरों के पद सृजित हुए और ही अलग हॉस्पिटल का दर्जा ही मिल पाया है। सिर्फ अस्पताल भवन ही अलग है, लेकिन यह राजीव गांधी अस्पताल की इकाई मात्र है। यहां पांच डॉक्टर होने के बावजूद कमी बनी रहती है। क्योंकि सिजेरियन से डिलेवरी होने के दौरान बच्चे की जांच के लिए एक डॉक्टर को जनाना अस्पताल रहना पड़ता है। इमरजेंसी और डे ड्यूटी में भी चिकित्सा अधिकारी होने के कारण ड्यूटी देनी पड़ती है। एक डॉक्टर इनडोर राउंड पर रहता है। इन हालातों में अगर एक डॉक्टर ट्रेनिंग और अवकाश पर चले जाए पूरी व्यवस्था चौपट हो जाती है।
^अभीग्रामीण क्षेत्र में 7 सीएचसी में ही बच्चों के डॉक्टर कार्यरत हैं। पद सृजित का निर्णय निदेशालय स्तर पर होता है। लेकिन अभी मात्र 15 सीएचसी में ही शिशु रोग कनिष्ठ विशेषज्ञ के पद हैं। रिक्त पदों की सूचना समय-समय पर निदेशालय भेजी जाती है। डॉ.आर के मीणा सीएमएचओ अलवर
राजकुमार जैन | अलवर
लक्ष्मणगढ़क्षेत्र में डिप्थीरिया ने छह बच्चों की जान ली। यह घटना दीपावली के तुरंत बाद की है। वहां बच्चों का डाक्टर नहीं होने के कारण हालात बिगड़े। इतने बड़े हादसे के बाद भी चिकित्सा विभाग बच्चों के उपचार को लेकर गंभीर नहीं है। उपचार के संसाधन और दवा तो दूर की बात डॉक्टरों के खाली पद भरने की कवायद तक शुरू नहीं हुई। ग्रामीण इलाकों में तो बच्चों को देखने के लिए डाक्टर हैं ही नहीं। जिले में 12 साल तक के कुल करीब 10 लाख बच्चे हैं, जिनके उपचार के लिए मात्र 12 डॉक्टर हैं। इनमें से सात डॉक्टर गांवों में हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में बच्चों की चिकित्सा सुविधा के बच्चों के डाक्टरों के 14 पद हैं, इनमें से 8 पद खाली हैं। जिले में डॉक्टरों के कुल 19 पदों में से पांच डॉक्टर जिला मुख्यालय पर हैं। जिला मुख्यालय पर स्वीकृत चार पदों पर पांच डॉक्टर तो हैं, लेकिन इनमें विशेषज्ञ कोई नहीं हैं। अति गंभीर बीमार बच्चों को जिला मुख्यालय से भी रैफर करने की मजबूरी रहती है। वहीं ग्रामीण क्षेत्र में 36 सीएचसी एवं 122 पीएचसी पर तो बीमार बच्चों को लेकर लोग भटकते ही नजर आते हैं। डॉक्टरों का मानना है कि जिला मुख्यालय पर विशेषज्ञ और सभी सीएचसी पर डॉक्टर हों, तब चिकित्सा व्यवस्था संतोषजनक मानी जा सकती है।
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