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- \"अरिहंत परमात्मा के परिचय बिना जीवन निष्फल\'
\"अरिहंत परमात्मा के परिचय बिना जीवन निष्फल\'
महावीरबाजार स्थित संभवनाथ दादा के दरबार में रविवार को परमात्मा भक्ति स्वरूप संगीतमय अरिहंत वंदनावली का अनूठा एवं ऐतिहासिक अनुष्ठान आचार्य पुण्यर|सूरि मसा एवं यशोर| सूरि मसा के सान्निध्य में संपन्न हुआ।
आचार्य यशोर|सूरि मसा ने अरिहंत वंदनावली पर जानकारी देते हुए कहा कि आज का मानव जीवन में सुख-शांति पाने के लिए भटक रहा है, परंतु परमात्म भक्ति रूप श्रेष्ठ एवं सरल उपाय को भूल गया है। अरिहंत परमात्मा के परिचय बिना जन्म निष्फल है। इस विश्व में सर्वश्रेष्ठ भक्ति पात्र अरिहंत है, उनकी भक्ति करने वालों को शांति-समाधि और सुख-समृद्धि छोड़ती नहीं है। पुण्य एवं गुणों की पराकाष्ठा अरिहंत प्रभु में होती है, गुणवान की भक्ति से गुणों की प्राप्ति होती है। आचार्य प्रवर ने कहा कि अरिहंत परमात्मा की भक्ति का सौभाग्य देवों को प्राप्त हुआ था। परमात्मा के कल्याणकों में तीनों लोक में सुख की अनुभूति होती है। प्रभु के कल्याणकों एवं समवसरण में देवों द्वारा की गई भक्ति का वर्णन श्री जंबूद्वीप प्रज्ञप्ति एवं श्री समवायांग सूत्र आदि में दर्ज है। उन्होंने कहा कि परमात्मा की उत्कृष्ट द्रव्य एवं विनय से की गई भक्ति से सम्यग्दर्शन की शुद्धि होती है, जो धर्म की नींव है। द्रव्य से पूजा से भाव पूजा की प्राप्ति सुलभ होती है। आचार्य प्रवर ने अरिहंत वंदनावली के तहत परमात्मा के चवन कल्याणक से मोक्ष तक के सफर का परिचय करवाते हुए लोगों को परमात्मा की भक्ति में तल्लीन होने का आह्वान किया। कार्यक्रम के तहत अरिहंत वंदनावली की 49 गाथाओं का पाली से आए गुरूभक्त एवं संगीतकार सुनील जैन ने एक बाद एक गाथा को मधुर संगीत के साथ सुनाए। कार्यक्रम के लाभार्थी देवलियांकला निवासी पदमसिंह नरेंद्र कुमार बाबेल रहे। श्री जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ मंत्री टीकम चंद गोखरू एवं अन्य ने उनका बहुमान किया। अरिहंत वंदनावली के अनूठे आयोजन के दौरान देवी-देवता के रूप में पूजा वस्त्र एवं सिर पर मुकुट सौभायमान कर पूजा करने वालो ने तो परमात्मा की पूजा का लाभ लिया ही पाण्डाल में मौजूद श्रद्धालु भाव-विभोर होकर उल्लास में डूबे रहे।
विजयनगरके लाल ने की रचना : अरिहंतवंदनावली की रचना एक वीर माता की प्रेरणा से विजयनगर के ही लाल ने वर्षों पूर्व की थी। दरअसल यह बिजयनगर नहीं अहमदाबाद के विजयनगर निवासी चंदू थे। आचार्य प्रवर ने बताया कि चंदू