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मानवता के हित की प्राणवायु थे गुरु पन्ना

5 वर्ष पहले
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^गुरुदेवपन्नालाल जी म.सा. ने जीवन भर सम्पूर्ण मानव जाति को अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरत्व की ओर अभिमुख किया। नतीजन आज भी प्राज्ञवर की प्रेरणा से विभिन्न संस्थाएं मानव सेवार्थ जुटकर एक मिसाल कायम किए हुए है। ज्ञानचंदहरकावत, अध्यक्ष श्री प्राज्ञ पब्लिक स्कूल, बिजयनगर

^परमात्माऔर भक्त के बीच की स्पर्श कड़ी को जाैड़ने वाले इस धरा पर एक महान व्यक्तित्व गुरु पन्ना का नाम जुबां पर आने के साथ ही हृदय का रोम-रोम खिलने से नहीं रहता। सुरेशचंदलुणावत, तिलोरा

गुलाब की तरह खिलना सिखाता है

^गुरुदेवका आध्यात्मिक जीवन गुलाब की तरह खिलना, महकना सिखाता हैं, चंदन की तरह जीवन में शीतलता भरता है। अलौकिक भावनाओं का दीप प्रज्वल्लित करता है। गुरुदेव ने कुंभकार के रूप में अपने शिष्यों को जैन जीवन शैली एवं संयम को जीवन का आधार बनाने की सदैव प्रेरणा दी। -सम्पतराजलुणावत, समाजसेवी

^जिस प्रकार हर कोई हीरा कोहिनूर नहीं होता है, हर वन नंदनवन नहीं होता, हर नदी गंगा हर पर्वत सुमेरू नहीं होता उसी प्रकार गुरु पन्ना जैसे सदगुरु भी हर किसी को नसीब नहीं होते। मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे ऐसे महापुरुष का सानिध्य मिला जिसके सम्बोधन से आज भी चित्त में अध्यात्म की लहरे उठती हैं। प्रत्येक रविवार को गुरुदेव के साथ मीठी दया का दृश्य भुलाया नहीं जा सकता। -ज्ञानसिंहसांखला, मंत्री,जैन श्वेतांबर स्थानक संघ

भास्कर न्यूज| जितेन्द्र मुणोत

भास्करन्यूज. बिजयनगर. सागर की गहराई से भी गहरा था जिनका ध्यान, तपस्या की मूर्ति थे वे तपोधान, आकाश की ऊंचाई जैसा ऊंचा है जिनका मान, प्राज्ञवर गुरु पन्ना है उनका नाम। ये पंक्तियां गुरुदेव पन्नालाल जी महाराज पर सटीक साबित होती हैं। राव बिजय सिंह ने जहां अपने सुंदर सपनों का शहर बिजयनगर बसाया वहीं जनहितार्थ सपनों के पंख लगाने में गुरु पन्ना की प्रेरणा योगदान को शहरवासी कभी भुला नहीं सकते। आज उस तारणहार को प्रणाम करने के लिए पुण्य स्मृति दिवस मनाया जा रहा है। प्राज्ञवर पन्नालाल जी महाराज का जन्म राजस्थान में नागौर जिले के कीतलसर गांव में विक्रम संवत 1845 में भाद्रपद सुदी 3 शनिवार तदनुसार 9 सितंबर 1888 को माली जाति के हिन्दू परिवार में हुआ था। पिता बालूराम एवं माता तुलसा बाई साधारण किसान थे। संसार से विरक्त होकर उन्होंने मात्र 11 वर्ष की आयु में जैन संत मोतीलाल जी महाराज से जैन धर्म में दीक्षा ग्रहण की। हिंदी, संस्कृत, प्राकृत, राजस्थानी भाषाओं के अध्ययन के साथ ही प्राज्ञवर पन्नालाल जी महाराज ने योग, न्याय, सांख्य, मीमांसा, वैशेषिक, वेदांत, जैन एवं बौद्ध दर्शन का गूढ़ अध्ययन किया।

इनकाव्यों की रचना की

आध्यात्मिकअनुभूतियों, सामाजिक जीवन यथार्थ के निकटता से अवलोकन एवं भाव प्रवणता के फलस्वरूप गुरुदेव ने जैन पर्व समलोचना, प्राज्ञ जिनागम द्विपंचशिका, प्राज्ञ पुंज, रक्षिका संबंध, भागचंद चरित्र, शील सप्तमी आख्यान आदि काव्यों की रचना की। गोरक्षाके लिए समर्पित : गुरुदेवगोरक्षा के लिए सदैव समर्पित रहे। विक्रम संवत 2002 के गुलाबपुरा चातुर्मास के दौरान अपने 125 गायों को मेवाड़ से कत्लखाने ले जाने की सूचना के बाद श्रावकों को प्रेरणा प्रदान कर गायों की प्राण बचाने की घटना आज भी बुजुर्गों की जुबानी सुनी जाती है। उनकी प्रेरणा से कई जगह पशु बलि प्रथा समाप्त हुई।

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