पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • National
  • मध्यप्रदेश आैर राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान है गूगोर मेला

मध्यप्रदेश आैर राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान है गूगोर मेला

5 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
गूगोरका ऐतिहासिक मेला दो राज्यों की सांस्कृतिक पहचान है। कस्बे से 8 किमी दूर स्थित गूगोर ग्राम पंचायत की ओर से हर साल मौनी अमावस से इसका शुभारंभ जोर-शोर से किया जाता है। छबड़ा क्षेत्र के ग्रामीण अंचल का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण मेला है। इसको लेकर राज्य ही नहीं मप्र के लोगों को भी इस मेले का बेसब्री से इंतजार रहता है। करीब 100 वर्ष पूर्व इस मेले की शुरूआत हुई और अनवरत इसका आयोजन किया जाता है। यहां पर देश के विभिन्न प्रांतों से व्यापारी दुकानदार आते हैं और मेले का अानंद उठाने के लिए दोनों राज्यों के लोग भी बड़ी संख्या में आते हैं। बीजासन माता मंदिर के समीप पार्वती नदी के तट पर लगने वाले इस मेले में आने वाले लोग यहां मंदिर में अपनी मन्नतें पूरी करने भी आते हैं और दर्शन करने के लिए लोगों की भीड़ लगी रहती है।

बसंतपंचमी तक होता है आयोजन

बीजासनमाता के नाम से प्रसिद्ध मेला अमावस से हाेता है। यह मेला बसंत पंचमी से पूर्णिमा तक पूरी तरह यौवन पर रहता है। इस मेले में जहां लोग बड़ी संख्या में खरीदारी करने के लिए आते हैं तो कई क्षेत्रों से लोग मंदिर में दर्शन करने का लाभ उठाते हैं। यहां पर खींची वंशजों की कुलदेवी की प्राचीन मूर्ति चमत्कारिक मानी जाती है।

पूर्व में होती थी पशु बलि

पूर्व के सालों में यहां लोग अपनी मन्नतें पूरी होने के बाद पशु बलि चढ़ाते थे, लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे इस परंपरा काे बंद कर दिया गया और अब यहां पर लोग नारियल, चुनरी, ध्वजा के अलावा अन्य प्रसादी चढ़ाते हैं।

पूर्वमुख्यमंत्री की कुलदेवी का है मंदिर

बीजासनमाता के मंदिर में मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह की कुलदेवी की प्रतिमा विराजित है। किंवदंती है कि बीजासन माता कालांतर में गूगोर के किले में स्थापित थी, लेकिन मुगलों की ओर से किए गए आक्रमण कर किले पर कब्जा कर शासन करने के बाद माता की मूर्ति स्वयं किले से निकलकर पार्वती नदी के किनारे विराजमान हो गई। जहां ग्रामीण छोटी सी छतरी बनाकर उनकी पूजा-अर्चना करने लगे। इसी मंदिर नदी के तट पर पिछले 100 वर्षो से भी अधिक समय से मेला लगता रहा है। आज भी बीजासन माता खींची वंशजों अलावा अन्य समाजों के कई परिवारों की भी ईष्ट देवी है।

रमणीकलगता है नदी का किनारा: पार्वतीनदी के किनारे तथा आसपास ऐतिहासिक छतरियां, महल, किला, झरने, जंगल एवं पहाड़ी के बीच होने के कारण मेले का दृश्य रमणीक लगता है। नदी के दूसरे किनारे पर मप्र की सीमा होने के कारण मप्र सरकार की ओर से वहां भी इसी तरह का मेला लगाया जाता है, जहां प्रतिदिन हजारों की संख्या में लोग माता के दर्शन कर मेले का आनंद लेते हैं और खरीदारी करते हैं। गूगोर मेले में वर्षों पूर्व पशुओं की भी खरीद फरोख्त होती थ्ज्ञी। इसकी व्यवस्था पंचाययत राज विभाग पशुपालन विभाग संभालता था। इस मेले में राज्य सहित मप्र, हरियाणा, पंजाब आदि प्रांतों के व्यापारी पशुओं की खरीदारी करते थे और बेचते थे। इनमें घोडे़, बैल, गाय,भैंस,बकरी आदि जानवरो की भारी खरीदारी होती थी।

छबड़ा. कस्बे के समीप स्थित गूगोर किला।

खबरें और भी हैं...