झुंझुनूं. पूर्व केंद्रीय मंत्री शीशराम ओला की चर्चा चलते ही गिडानिया के पूर्व सरपंच अजीज खान भावुक हो जाते हैं। बरसों पुरानी यादों में उनकी आंखें भीग जाती हैं। वे बाल सखा रहे हैं।
यह दोस्ती आखिर तक बनी रही। अजीज अब भी ओला परिवार में सम्माननीय हैं। दिग्गज नेता और किसानों के मसीहा ओला की पहली पुण्यतिथि पर उनके दोस्त अजीज खां ने \\"भास्कर\\' से साझा की कुछ यादें...
वैसे मुझे नहीं पता कि साहब (शीशराम ओला) और मुझमें कौन बड़ा था? लेकिन मैंने हमेशा उन्हें ही बड़ा माना। मेरा ननिहाल अरड़ावता है। छह-सात साल की उम्र से यहां उनके के साथ खेला। यहहीं पला और बढ़ा हुआ। बचपन की यह दोस्ती मेरे गांव गिडानिया की बेटी श्योबाई से उनकी शादी होने पर रिश्तेदारी में बदल गई।
मैट्रिक तक पढ़ने के बाद साहब फौज में भर्ती हो गए। चार-पांच साल नौकरी करने के बाद लौटे तो सरपंच बने। जिसके बाद जिले, राजस्थान और देश की राजनीति में नाम कमाया। जनरल मानेक शा के जमाने में फौज के क्षेत्रीय ऑनरेरी रिक्रूटमेंट ऑफिसर (भर्ती अधिकारी) रहे साहब ने जिले के अनगिनत युवाओं की केवल लकड़ी से लंबाई नापकर और शारीरिक सौष्ठव देखकर सेना में भर्ती करवाया था। वे किसानों, फौजियों और मजबूर लोगों के हमर्दद हितैषी थे।
साहब कर्मठ और ऊर्जावान राजनेता होने के साथ-साथ पर्यावरण प्रेमी और बालिका शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। आजादी के बाद जब यहां घूंघट प्रथा चरम पर थी उस दौर में उन्होंने अरड़ावता में बालिका शिक्षा के प्राथमिक केंद्र की स्थापना करवाई। 1952 में गांव उसके साथ लगते इलाके की कुछेक बच्चियों के नामांकन से खोली गई इस संस्था ने इंदिरा गांधी बालिका शिक्षा निकेतन का रूप ले लिया।
इसमें बालिकाओं के लिए प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा तक की व्यवस्था करवाई। साहब पौधे लगाने-लगवाने में ही नहीं बल्कि सार-संभाल रखवाने में भी बड़ी रुचि रखते थे। वे जब भी अरड़ावता से बाहर दूरस्थ इलाके में जाते, वहां से फल-फूल और छायादार पौधे जरूर लाते। जिन्हें शिक्षा निकेतन परिसर में लगवाते। दक्षिण भारत से मंगवाए कल्प वृक्षों को प्रणाम करके ही वे अरड़ावता से कहीं बाहर यात्रा पर जाते थे।