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पुण्यवानी बढ़ाने का सत्कार्य करते रहो

7 वर्ष पहले
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चित्तौड़गढ़ | संपत्तिपुण्यवानी से प्राप्त होती है। यदि पुण्यवानी प्रबल है तो सभी परिस्थितियां अनुकूल बन जाएंगी और चारों ओर से पैसा आने लगेगा। लेकिन जब पुण्यवानी समाप्त होती है तो चारों ओर से विपदाएं आती हैं। इसलिए ज्ञानी व्यक्ति वही है जो सुख के क्षणों में अपनी पुण्यवानी को बढ़ाने का सदकार्य करता रहता है। यह विचार शासन दीपक अक्षय मुनि ने अरिहंत भवन में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि यदि क्रोध, मान, माया, लोभ रूपी कषाय के पौधे धर्म रूपी पौधे के साथ लगे हैं तो धर्म साधना को बढ़ने नहीं देंगे। सबसे पहले हमें क्रोध, मान, माया, लोभ को कम करते हुए वर्तमान में जीने का प्रयास करना चाहिए और निष्काम भाव से धर्म साधना करना चाहिए। साधु की परीक्षा करनी हो तो केवल यह देख लें कि वह संतोष भाव से जी रहा है या नहीं। स्थिति यह है कि अपने आप को संत कहलाने वाले अरबों की संपत्ति पर कुंडली मारकर बैठे हैं तो संतोष भाव से कैसे जी सकेंगे। संत श्रीचंद ने कहा कि ब्रह्मचर्य पालन के लिए कामोत्तेजक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। संचालन मंत्री विमल कुमार कोठारी ने किया।