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जीवन शैली निष्ठा प्रधान होनी चाहिए

7 वर्ष पहले
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सिद्धांतों की रटन ज्यादा है और प्रयोग कम, इसलिए धर्म बना है। आचरण बदल रहा है, अंत:करण नहीं, प्रवृत्तियां बदल रही हैं वृत्तियां नहीं, वेश बदल रहा है व्यवहार नहीं। ज्ञान के क्षेत्र में व्यक्ति आगे बढ़ता है पर ज्ञान से पहले सम्यक दर्शन नहीं तो वह ज्ञान, ज्ञान नहीं अज्ञान है। इसलिए ज्ञानियों ने कहा कि हमारी जीवन शैली निष्ठा प्रधान होना चाहिए। निष्ठा यानि आस्था, विश्वास, सम्यक दर्शन।

यह विचार महासती पदम श्री ने खातर महल में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शून्य कितने ही हों पर अंक आगे नहीं लगा हुआ है तो शून्य की कीमत नहीं होती। वैसे ही सम्यक दर्शन अंक के समान है फिर ज्ञान चारित्र तप आदि शून्य है। अंक के बाद शून्य लगे तो उसकी कीमत 10 गुणा बढ़ जाती है। क्योंकि आस्था के हिले दांतों से साधना के कड़े चने चबाए नहीं जाते, निर्बल निष्ठा की नींव पर समोन्नति के उन्नत प्रसाद नहीं उठाए जाते। रविवार को महासती पदमश्री के जन्म दिवस पर सामूहिक एकासन एवं क्विज प्रतियोगिता दोपहर एक बजे होगी। सभा में साधुमार्गी शांतक्रांति जैन श्रावक संघ के केंद्रीय महामंत्री शांतिलाल कोठारी उपस्थित हुए। यह जानकारी प्रवक्ता इंद्रसिंह पामेचा ने दी।