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रचना की प्रासंगिकता का निर्धारण करती है आलोचना : डॉ व्यास
राजस्थानी साहित्य में आलोचना एवं शोध की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन की दिशा में प्रयास संस्थान की ओर से शुरू की गई ‘आलोचना शोध पत्रिका के प्रवेशांक का जिला मुख्यालय स्थित सूचना केंद्र में शनिवार को लोकार्पण हुआ। समारोह में प्रवासी श्याम गोइन्का का अभिनंदन भी किया गया।मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. भवानीशंकर व्यास विनोद ने कहा कि साहित्य में आलोचना इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वह रचना की प्रासंगिकता का निर्धारण करती है। उन्होंने कहा कि आलोचना के बिना साहित्य कमजोर हो जाता है।
विशिष्ट अतिथि राजस्थानी के आलोचक डॉ कुंदन माली ने कहा कि राजस्थानी आलोचना पर प्रकाश डालते हुए पत्रिका के आरंभ को बेहतर पहल बताया और कहा कि राजस्थानी आलोचना में अपेक्षा के अनुरूप प्रगति नहीं हुई। विशिष्ट अतिथि श्याम गोइन्का ने कहा कि राजस्थानी दुनिया की महत्वपूर्ण भाषाओं में से एक है। इसका अपना शब्द कोष है, व्याकरण है और लोक है। जोधपुर विवि में राजस्थानी के विभागाध्यक्ष डॉ गजेसिंह राजपुरोहित, विकास अधिकारी महेंद्र गोदारा ने भी संबोधित किया। अध्यक्षता करते हुए आनंद कौर व्यास ने कहा कि आलोचक का कार्य नट की तरह संतुलन बनाए रखना है लेकिन आज खरी खाली आलोचना दुर्लभ हो गई है। पत्रिका की संपादक डॉ कृष्णा जाखड़ दुलाराम सहारण ने संबोधित किया। भंवर सिंह सामौर ने आभार जताया। संचालन कमल शर्मा ने किया।