अतीत के पन्नों में खो गई रामलीलाएं
वर्तमानकी बदलती लाइफस्टाइल हमारी परंपराओं संस्कृति के संरक्षण में अवरोध बन गई है। इस कारण रामलीला रासलीला के आयोजन अतीत के पन्नों पर खोते नजर रहे हैं। शहर के बुजुर्ग बताते हैं कि किसी समय में रामलीला का इतना क्रेज था कि सांझ ढलते ही रामलीला स्थलों पर लोग घंटों पहले ही देखने के लिए बरबस खिंचे चले आते थे। मगर तेजी से बदल रहे वक्त की धूल ने रामलीला के आयोजन पर खासा प्रभाव डाल दिया है।
वर्षों बीत गए शहर में एक भी जगह रामलीला का आयोजन नहीं होने से अब करीब करीब रामलीला तथा रासलीला के आयोजन लुप्तप्राय हो गए हैं। इसके स्थान पर नवरात्रा में जगह जगह मंडपों की स्थापना, देवी जागरण, गणेश महोत्सव इत्यादि आयोजनों ने ले ली है। लगभग 4 दशक पहले जिले में कई स्थानों पर शारदीय नवरात्रा से रामलीलाओं का आयोजन शुरू हो जाता था। जिले के नगरीय एवं ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग रामलीला के आयोजन की बेसब्री से प्रतीक्षा करते थे। कई स्थानों पर तो रामलीलाओं में चरित्र कलाकार स्थानीय होते थे, जो वर्ष भर तक रामलीला के पात्र का रिहर्सल करते थे। जबकि बडे आयोजनों में मथुरा, वृंदावन गोवर्धन की रामलीला रासलीला मंडलियां अपनी प्रस्तुतियां देकर श्रोताओं को भरपूर मनोरंजन करती थीं। आज शहर में रामलीला रासलीला का आयोजन देखने को भी नसीब नहीं है। इसके पीछे मुख्य यह भी कारण रहा है कि आज की भागदौड़ की जिंदगी में लोग इन बड़े आयोजनों की जिम्मेदारी से कतराने लगे हैं। स्थानीय नागरिक मुकेश सूतल ने रामलीला के आयोजनों पर चर्चा करते हुए बताया कि आज शहर में एक भी जगह रामलीला का आयोजन नहीं होता है। लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व शहर के हर मौहल्ले गली में युवा वर्ग की ओर से चंदा एकत्रित कर छोटे स्तर पर रामलीलाएं हुआ करती थीं, जिसमें बाहर से मथुरा वृंदावन के कलाकार यहां आकर रामलीला करते थे और यह दौर हर वर्ष चलता था। मगर अब कई वर्षों से शहर में रामलीलाएं रासलीला का आयोजन भविष्य के गर्त में छिप गया है।
पहले होती थी सक्रिय भूमिका, अब नहीं
90वर्षीय बुजुर्ग हनुमान मंदिर के पुजारी प्रीतमदास ने बताया कि हमारे समय में रामलीलाओं की धूम हुआ करती थी। इसके लिए स्थानीय कलाकार महीने भर पहले से तैयारी शुरू कर रामलीला का आयोजन सफलतापूर्वक कराते थे। मगर आज वर्षाेंं से बंद हुई रामलीला रासलीला का आयाेजन दुर्भाग्य की बात है। प्रशासन की ओर से भ