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भारतीय संस्कृति की शिक्षा ही श्रेष्ठ : प्रजापति

7 वर्ष पहले
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धोरीमन्ना. आदर्श विद्या मंदिर धोरीमन्ना में मातृ सम्मेलन का आयोजन हुआ। सम्मेलन में महंत रामकिशोराचार्य महाराज मरूधर पीठाधीश्वर रामबाग मंदिर गुड़ामालानी के पावन सानिध्य में हुआ। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता वासुदेव प्रजापति ने भारतीय संस्कृति को विश्व की महान संस्कृति बताते हुए इसके अनुसार प्राप्त शिक्षा से ही बालक के सर्वांगीण विकास की बात कही। बालक उसी शिक्षा को आसानी से ग्रहण करता है जिसका संबंध उसकी मां से है। वर्तमान भारतीय संस्कृति की रक्षक वाहक मां ही है। माता यदि कुछ कार्य करने की ठान ले तो उसे पूरा करके रहती है। वर्तमान में अंग्रेजी माध्यम के प्रति लोगों की धारणा अधिक होने से हम अपनी ही संस्कृति से कटते जा रहे हैं। कार्यक्रम में जगह-जगह से आए संतों का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। प्रधानाचार्य देरामाराम विश्नोई ने वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। इस दौरान विधालय को 400 बैग सिमेंट देने की घोषणा की गई। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि मानी बाई खत्री, विशिष्ट अतिथि सुशीला चौधरी तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता सावित्री जाजू ने की। संस्था प्रधान दे रामाराम विश्नोई ने सभी का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में उम्मेदाराम, पवन त्रिपाठी, किशनाराम विश्नोई एवं बाल वक्ता स्वरूप जैन का योगदान सराहनीय रहा। कार्यक्रम का संचालन राणुलाल जैन ने किया।

बच्चेकी पहली गुरु मां

बाटाडू.अखिलभारतीय शिक्षा संस्थान विद्या भारती से प्रेरित आदर्श शिक्षण समिति बाड़मेर द्वारा संचालित आदर्श विद्या मन्दिर में सोमवार को मातृशाक्ति सम्मलेन का आयोजन हुआ। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता विद्या भारती जोधपुर प्रांत के प्रांतीय कार्यकारिणी सदस्य वासुदेव प्रजापति ने कहा कि मां बच्चे की पहली शिक्षक होती है। बच्चा विद्यालय से कही ज्यादा ज्ञान अपने परिवार में मां से प्राप्त करता है। मां के कई उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मां बच्चे को संन्यासी से चक्रवर्ती सम्राट तक बना सकती है। उन्होंने कहा कि विलुप्त हो चुकी भारतीय शिक्षा पद्धति को विद्या भारती पुनः विद्या मंदिर के माध्यम से स्थापित कर भावी पीढ़ी को योग्य एवं देशभक्त नागरिक बनाने के लिए प्रयासरत है।

मुख्य अतिथि राकेश शर्मा ने कहा कि शिक्षक तो बच्चे का आधार रखते हैं। उसे पूर्ण इमारत बनाने की जिम्मेदारी मां की होती है। आज इस भागदौड़ भरी जिन्दगी में मां अगर थोड़ा सा समय भी अपनी स