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‘मन की व्यथा किससे कहें अब कौन है तू दरपन ये पूछे’

5 वर्ष पहले
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वागड़विभा साहित्य एवं कला संस्थान की मासिक गोष्ठी रविवार को स्थानीय जयहिंद नगर स्थित श्रीजी कुंज में आयोजित की गई।

युवा शायर सुनील मेहता ‘सहर’ की अध्यक्षता में काव्य गोष्ठी की शुरुआत मनीषा पंड्या ‘जियाश्री’ द्वारा प्रस्तुत मां शारदे की वंदना से हुई। गोष्ठी में गीतकार हेमंत शर्मा के गीत ‘अपने भी इक इक कर छूटे, सपने भी इक इक कर टूटे, मन की व्यथा किससे कहें अब, कौन है तू दरपन ये पूछे’ ने इंसानी जीवन में दरकते रिश्तों का सजीव चित्रण किया।

गजलकार उपेंद्रसिंह ‘उपेन’ ने अपनी गजल ‘धूप हो तेज तो साये का खयाल आता है, ऐसे अब कौन दरख्तों के पास जाता है’ सुनाकर खूब वाहवाही लूटी। वहीं, कन्या भ्रूण हत्या पर केंद्रित उनकी रचना ‘पापा मेरे’ ने भावुक कर दिया।गोष्ठी में बाल कवयित्री जियाश्री पंड्या ने स्वच्छता का संदेश देती कविता सुनाकर सभी को मुग्ध कर दिया। विकास नगर के युवा कवि हर्षिल पाटीदार ‘नव’ ने अपनी रचना ‘मां का क्रंदन’ में वैवाहिक जीवन की परिस्थितियों को उजागर किया। वहीं, नरेंद्र शर्मा ‘बोधा’ ने नारी की महिमा का बखान करती रचना प्रस्तुत की।

सत्यदेव पंचाल ‘सत्येश’ ने मुक्तक ‘कभी दीवारों से घर बनता नहीं, मुर्दाघरों में कोई भी बसता नहीं’ तथा ताजमहल पर केंद्रित कविता सुनाई। राजकुमार कसारा ने लघु कविताओं से मौजूदा परिवेश को रेखांकित किया। कवयित्री मनीषा पंड्या की रचना ‘राम की अयोध्या में रावण आकर बैठा है’ को भरपूर सराहना मिली।

युवा शायर सुनील मेहता “सहर’ द्वारा प्रस्तुत ‘ये खंडहर में वीराने, आहें डूब जाती है कभी, मौत के आते-आते, जिंदगी रूठ जाती है कभी’ सहित उम्दा शेर सुनाकर गोष्ठी को नई ऊंचाइयां प्रदान की।

डूंगरपुर. वागड़ विभा की काव्य गोष्ठी में कविता पाठ करती रचनाकार।

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