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कहीं थम गई तो कहीं अंतिम दौर में गवरी की धूम
डूंगला. करीबएक माह पूर्व से अधिक समय से चल रही गवरी नृत्य की धूम कहीं एकादशी तो कहीं द्वादशी को थम गई। गवरी नृत्य दल से जुड़े उंकारलाल गमेती ने बताया की माताजी की पूजा अर्चना के साथ गवरी नृत्य बंद हुआ। उन्होंने बताया की हम लगभग 20 साथी मुंबई से काम छोड़ कर हर बार गवरी नृत्य के लिए गांव आते हैं। इस परंपरा को निभाने के लिए सरकारी सेवा में कार्यरत कई साथी तो सवा महीने का अवकाश लेकर सहयोग करते हैं।
आकोला.सूरताखेड़ास्थित चारभुजा मंदिर पर गवरी नृत्य हुआ। बड़ी संख्या में लोग जमा हुए। भील समाज के लोगों ने बताया कि गवरी नृत्य मेवाड़ की प्राचीन परंपरा है, जो रियासतकाल में राजा, महाराजा पटेलों के सानिध्य में किया जाता था। आज भी जो लोग पूरे माह गवरी नृत्य में रहते हैं, वे इसके सिवाय और कोई काम नहीं करते। यहां नवरात्र से एक दिन पहले इसका समापन हो जाता है।