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खेजड़ी का गाइनोड्रामा रोग छह महीने में हो सकेगा ठीक

7 वर्ष पहले
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लंबी रिसर्च के बाद कृषि वैज्ञानिकों ने खोजा उपचार, नई विधि से रोका जा सकेगा संक्रमण

सीकर. खेजड़ीको नष्ट करने वाले गाइनोड्रामा (भफोड़ा) रोग का कृषि वैज्ञानिकों ने इलाज ढूंढ़ लिया है। इसका उपचार छह महीने में हो सकता है। इसके बाद पौधा पूरी तरह स्वस्थ हो जाता है। लंबी रिसर्च के बाद कृषि विश्वविद्यालय बीकानेर, कृषि अनुसंधान केंद्र आफरी जोधपुर और कृषि अनुसंधान केंद्र फतेहपुर के वैज्ञानिकों ने नई विधि खोजी है।

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक खेजड़ी को भफोड़ा (गाइनोड्रामा) नामक कवक का संक्रमण होता है। इससे महज एक साल की अवधि में ही पौधा नष्ट हो जाता है। नई उपचार की विधि में 20 से 30 ग्राम तक थायोफिनेट मिथाइल फफूंदनाशक को 20 लीटर पानी में मिलाकर डाला जा सकता है। दवा डालने से पहले पौधे के चारों तरफ एक मीटर की परिधि में पानी की तलाई की जानी चाहिए। इसके बाद दवा के घोल को तलाई में डाल दें। यह प्रक्रिया एक माह बाद फिर दोहराएं। पांच माह बाद इसी मात्रा में तीसरा उपचार दिया जाने से पौध बच सकता है। उल्लेखनीय है कि प्रदेश में एक दशक में कवक के संक्रमण से 25 से 30 फीसदी खेजड़ी के पौधे नष्ट हो चुके है। शेखावाटी में यह आंकड़ा 50 फीसदी है। रिसर्च से जुड़े फतेहपुर कृषि अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक डा. सहदेव सिंह, चौखा राम, महावीर सिंह डा. महेंद्र सिंह का कहना है कि यह विधि काफी कारगार साबित हो सकती है।

ग्राफ्टेड विधि से तैयार की उन्नत किस्म

उन्नतकिस्म से अब शेखावाटी की धरती को हरीभरी करने के लिए ग्राफ्टेड पाैधे लगाने की शुरुआत हो चुकी है। स्वामी केशवानंद कृषि सीकर झुंझुनूं के 82 खेतों में 1300 पौध लगाई हैं। फतेहपुर अनुसंधान केंद्र प्रभारी जुनैद अख्तर के अनुसार अगले साल 10 हजार पौधे लगाने का लक्ष्य है। ग्राफ्टेड पौध की खास बात यह है कि इस विधि से तैयार किए गए पौधों

रोग की पहचान का तरीका

शोधमें यह भी माना है कि इस रोग में पौधे का तना कमजोर होने लगता है। फूटान बंद हो जाती है। गाइड्रोमा का कवक 30 से 35 डिग्री तापमान के साथ 70 से 80 फीसदी नमी में एक्टिव होता है। पौधे में इसका असर जुताई के दौरान जड़ या छाल पर लगे ट्रैक्टर के कट से होता है। पहले चरण में तीन दिन तक बीजाणु बनते है। आठ दिन बाद पेड़ की जड़ों में भफोड़ा बनने लगता है। तीन माह में पौधा पूरी तरह से संक्रमित हो जाता है। पौधे में इसक