एक बेटा पहले खो चुकी हूं, अब और नहीं...
मैंएक बेटे को पढा़ई की भेंट चढ़ा चुकी हूं। अब अपने दूसरे बेटे-बेटियों को मौत के मुंह में नहीं भेज सकती। मंडपिया ग्राम पंचायत स्थित धोला दांता की एक महिला मिश्रीबाई बंजारा की यह पीड़ा स्कूल एकीकरण प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों को और गंभीर बना गई। उसने प्रशासन से गुहार की कि गांव के स्कूल को मर्ज करने की बजाय यथावत रखा जाए। इस सिलसिले में ग्रामीणों ने भी बुधवार को स्कूल के बाहर प्रदर्शन कर स्कूल को यथावत की मांग की। मांग पूरी नहीं होने पर भूख हड़ताल की चेतावनी भी दी।
एकीकरण के तहत प्रावि धोलादांता को भीलों का झूपड़ा प्रावि में मर्ज कर दिया गया। जबकि दोनों स्कूल के बीच की दूरी डेढ़ से दो किमी है। एकीकरण के नियमानुसार केवल एक किमी के दायरे में ही प्रावि को दूसरे स्कूल में विलय का प्रावधान है। मर्ज होने के बाद से अब तक भी धोला दांता के ग्रामीणों ने अपने बच्चों को पढ़ने भीलों के झूपड़ा प्रावि में नहीं भेजा। बुधवार को भी बच्चे ग्रामीण प्रदर्शन कर रहे थे। इसी दौरान बंजारा समाज की महिला मिश्री बंजारा ने भास्कर को बताया कि हम बच्चों को भीलों का झूपड़ा स्कूल क्यों नहीं भेजना चाहते। उसने रोते हुए बताया कि आठ साल पहले धोला दांता में स्कूल नहीं था। गांव के बच्चे भीलों का झूपड़ा पढ़ने जाते थे। दोनों गांव के बीच में एक ओर करीब सात आठ फीट गहरी नहर है। जिसमें पानी भरा रहता हैं तथा दूसरी ओर बड़ी नाड़ी है। आठ साल पहले भीलों का झूपड़ा स्कूल से घर आते समय मेरा बेटा घर नहर में डूब गया। इस घटना के बाद ग्रामीणों ने अपने बच्चों को भीलों का झूपड़ा जाने पर रोक लगा दी थी। पांच साल पहले सरकार ने धोलादांता में ही प्रावि खोला था। अब यह स्कूल भीलों का झूपड़ा में मर्ज हो गया है। गांव की सीता बंजारा ने भीलों का झूपड़ा में अपने बच्चों को स्कूल भेजने से इंकार करते हुए पढ़ाई छुड़ा दी। उसने बताया कि गाय-भैंस चरवाने के लिए भेज देंगे, लेकिन भीलों का झूपड़ा में पढ़ाई के लिए नहीं भेजेंगे। एडवोकेट पन्ना बंजारा ने बताया कि धोला दांता से भीलों का झूपड़ा के मध्य नहर एवं नाड़ी दुर्घटना का सबब बनी तथा दोनों गांवों के मध्य रास्ते में जंगल भी है। इसमें जंगली जानवर विचरण करते हैं। ग्रामीणों ने स्कूल को यथावत रखने की मांग करते हुए बताया कि यदि सरकार यह स्कूल बंद करेंगी तो, भूख हड़ताल करेंगे।
इस मांग के संबंध में ग्