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कुदरत की लीला ने बदली \"लीला\' की जिंदगी, इलाज की दरकार

7 वर्ष पहले
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{चार साल पहले पिता का साया भी उठा

भास्करन्यूज | चित्तौडगढ

लीलाकी जिंदगी में कुदरत ने ऐसी लीला रची कि खेलने की उम्र में उसके लिए मिट्टी-कंकड़ घास-फूस ही खिलौने बने रहे। और जब किताबों में मन लगाकर भविष्य की ओर देखना था। तब वह शून्य में निहारती नजर अाती है।

समीपस्थ आजोलिया का खेड़ा में लगभग 18 वर्षीय लीला पुत्री स्व. अंबालाल बैरवा का पूरा दिन घर के पास एक पेड़ के नीचे बीत जाता है। बचपन में किसी बीमारी पर लगाए गए इंजेक्शन के रिएक्शन ने लीला की मानसिक स्थिति ही नहीं, पूरी जिंदगी को ही बदतर कर दिया। वह सबसे अलग-थलग अपनी जिंदगी बीता रही है। पढ़ने-लिखने की उम्र में दीन-दुनिया से बेखबर पेड़ के नीचे जिंदगी गुजार रही है।

प्रेमबाई के पति अंबालाल बैरवा की लगभग चार साल पहले मौत हो गई। इसके बाद से परिवार की सारी जिम्मेदारी प्रेमबाई के ही कंधों पर गई।

गंगरार पीडब्लूडी में बतौर सहायक कर्मचारी प्रेमबाई तीन बेटियों की जिम्मेदारी उठाते हुए परिवार को संभाल रही हैं। पति की मौत के बाद परिवार में अब कोई पुरुष नहीं बचा है। लीला से बड़ी दो बेटियों की शादी पहले कर दी गई। लीला से छोटी दो बेटियां हैं, जिनकी उम्र 12 आठ साल है। सबसे बड़ी समस्या है कि वह लीला का इलाज कराए या घर को चलाए। प्रेमबाई बैरवा को इस बात की भी चिंता रहती है कि लीला की मानसिक हालत और उसका भविष्य कहीं दोनों छोटी बेटियों के भविष्य को प्रभावित नहीं करे।

चित्तौड़गढ़ | पेड़के नीचे रहने वाली लीला की संभाल करते हुए मां प्रेमबाई।

इलाज की चिंता

जिसउम्र में बेटी की शादी करनी होती है, उसमें एक मां को उसकी सार-संभाल इलाज की चिंता करनी पड़ रही है। एक तरफ मानसिक रोगी बेटी की सार-संभाल इलाज की चिंता और दूसरी ओर दो छोटी बेटियों समेत पूरे परिवार चलाने की जिम्मेदारी मां के सामने चुनौती है।