माता पिता के आशीर्वाद से आती है योग्यता आैर होशियारी
भास्कर संवाददाता | गुलाबपुरा
जबमाता कैकई ने राम से कहा कि तुम्हारे पिता से मैंने दो वरदान मांगें हैं। पहला भरत को राज तिलक और दूसरा तुम्हे 14 वर्ष का वनवास। मां की ये बात बात सुनकर राम प्रसन्न हुए। राम को इतनी खुशी हुई जैसे आषाढ़ में मोर पंख खोलकर नृत्य करता है। यह बात बजरंग मंडल के तत्वावधान में जारी रामकथा के दौरान संत अमृत राम महाराज ने कही। संत अमृत राम ने पुत्र की व्याख्या करते हुए कहा कि जो अपने स्वभाव, कर्म सुंदर आचरण से माता-पिता को संतुष्ट कर सके वो पुत्र होता है। मंदिर में बैठी मां सुख-समृद्धि, मोटर, बंगला देती हैं पर मानव शरीर घर की मां देती है। ऐसा शरीर देती है जिससे हम भगवान के द्वारा बनाया सुंदर संसार देख रहे हैं। पुत्र के जीवन में सुख-समृद्धि, योग्यता होशियारी माता-पिता के आशीर्वाद से ही आती है। संत ने माता-पिता की सेवा करने के लिए युवाओं से आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आज समाज में वृद्ध उपेक्षित हैं। जगह-जगह वृद्धाश्रम खोले जा रहे हैं। इससे साफ लगता है कि बच्चे माता-पिता की सेवा नहीं करना चाहते हैं। जो व्यक्ति माता-पिता की सेवा नहीं कर सकता उसकी मेहनत व्यर्थ है। कथा में लांबा के संत राम दास त्यागी, अजब राम महाराज मंचासीन थे। कथा में चंद्रकांता बाहेती, पूर्व पार्षद राज कंवर रांका, कथा आयोजक बजरंग मंडल के शंभू लाल गुप्ता, हनुमान सोमानी, महावीर लढ़ा, राम पाल जोशी, रामदयाल सोमानी, ओम प्रकाश राठी आदि उपस्थित थे।
गुलाबपुरा. कथावाचन करते रामस्नेही संत अमृत राम महाराज एवं उपस्थित श्रद्धालु।।
कोटड़ी. कस्बेके दशहरा मैदान में भागवत कथा सुनने आए श्रद्धालु।
कोटड़ी| नारीअगर धर्म के मार्ग को अपनाती है तो शादी से पहले पिता और शादी के बाद पति को तारती है। नारी शब्द प्रेम वात्सल्य का प्रतीक है। नारी त्याग बलिदान की कहानी, स्नेह और श्रद्धा की प्रतिमूर्ति है। नारी का उतना ही महत्व होता है जो महत्व मानव देह में नाड़ी का होता है। नारी को नारायणी, मातृ शक्ति कहा गया है। नारी को मर्यादा में रहना चाहिए। जो भी मर्यादा से बाहर निकली उसने जीवन बेकार कर लिया। व्यक्ति का जीवन खेल मैदान के समान है। खेल में जैसे लाइन लांघने पर खिलाड़ी आउट हो जाता है उसी प्रकार जिसने धर्म की लाइन को लांघ दी उसका जीवन जीते हुए भी मरने के समान होता है। लक्ष्मण ने सीता को लाइन के अंदर रहने की कहा लेकिन लाइन लांघी तो धर्म से वापस जुड़ने के लिए अपने ही पति को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी। यह विचार प्रेमनारायण महाराज ने व्यक्त किए। वे दशहरा मैदान में जारी श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन प्रवचन सभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रभु की भक्ति में भावना का विशेष महत्व है। व्यक्ति अगर भावना से पत्थर की भी पूजा करता है तो उसमें भगवान प्रकट हो जाते हैं। भक्त प्रहलाद की भक्ति से प्रसन्न होकर खंभे से भी भगवान नृसिंह ने अवतार लिया। इसलिए परमार्थ के लिए समय, समर्पण, स्वास्थ्य तथा श्रद्धा आवश्यक है। ईश्वर को एक पल, एक क्षण लाने के लिए जीवनभर निकल जाता है लेकिन वो ईश्वरीय एक पल जीवन में जाने से जीवन तर जाता है। व्यक्ति को जीवन सफल बनाने के लिए भगवान की कथा सुनने का प्रयास करना चाहिए। भगवान की वाणी का एक शब्द कानों में पड़ता है तथा उसे अपने जीवन में उतार लेता है तो भक्त से भगवान बनने का रास्ता बना लेता है। आयोजक श्याम परिवार डाबी तथा संपत कुमार जैन अरनिया रासा ने संत से आशीर्वाद लिया।