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200 मोर मारे गए लेकिन मारने वाले नामालूम

7 वर्ष पहले
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वर्ष 2013 में 40

वर्ष 2012 में 74

वर्ष 2011 में 25

कुछमुख्य मामले

नवंबर2014 में मेवाड़ मिल में 23 मोर मृत मिले।

मार्च 13 में सरसूंदा में 12 मोर मृत मिले।

मई 2012 में पनोतिया तालाब के निकट 30 बबराणा में 11 मोर मृत मिले।

जून 2009 में हलेड़ में 13

भास्कर न्यूज | भीलवाड़ा

पिछलेमाह मेवाड़ मिल परिसर में हुई 23 मोरों की हत्या के मामले में अपराधी ‘नामालूम है’। वन विभाग कोई ठोस सुराग नहीं जुटा पाया है। ऐसे ही पिछले पांच वर्ष के दौरान मारे गए 200 मोरों के मामले में भी वन विभाग की जांचों में अपराधी ‘नाम नामालूम’ चल रहे हैं।

इस तरह के 21 मामले हैं। जिनमें वन विभाग कुछ पता नहीं लगा पाया। इसके अतिरिक्त एक में अपराधी फरार है। इसमें वर्ष 2002 में पैंथर की संदिग्ध मौत का मामला भी है। मामले में एफआर तक नहीं लग पाई है। अधिकांश मामलों में वन विभाग शिकारियों का पता नहीं लग पाया। मामलों की जांच अब भी जारी है। डीएफओ बीपी पारीक ने बताया कि वन्यजीव अपराध के अधिकांश मामलों में सुराग लग पाना बहुत मुश्किल होता है। हमारी टीमें जांच करती हैं, लेकिन अभी भी कई मामले अनसुलझे हैं। एक कारण यह भी है कि हमारी विंग पुलिस की तरह नहीं है, हमारे पास साधन भी सीमित हैं, पुलिस से मदद लेकर कई मामलों में कार्रवाई का प्रयास करते हैं।

ताजामामले में यह कार्रवाई

मेवाड़मिल में मृत 23 मोरों के मामले में वन विभाग द्वारा की जा रही छानबीन में अनाज के संदिग्ध दाने यहां वहां बिखरे पड़े मिले। इन दानों को फोरेंसिक लेबोरेटरी अजमेर भिजवाया गया है, लेकिन अपराधी पकड़ में नहीं पाए हैं। विभाग द्वारा चार गार्ड ड्यूटी पर लगाए गए हैं। डीएफओ पारीक ने बताया कि सुबह-शाम ड्यूटी पर गार्ड वहां लगाए जाते हैं, जो मोरों पर नजर रखे हैं। वहां की संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी ली जा रही है।

फोरेंसिकरिपोर्ट में देरी

वर्ष2010 में हमीरगढ़ के दरी गांव के पास मारे गए 13 मोरों की विसरा रिपोर्ट डेढ़ साल बाद पाई। विभाग द्वारा इन दिनों 23 मोरों का विसरा भेजने में विलंब किया गया। वहां विसरा भेज दिया गया है, लेकिन विसरा रिपोर्ट आने में देरी पर विभाग भी सुस्ती दिखाता है।