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भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पूजा कराकर इंद्र का किया मान-मर्दन
इटावा. गायोंका पालन, चराने तथा उनके दूध को पीने के कारण भगवान कृष्ण का नाम गोपाल पड़ा। गो का वर्धन (बढ़ाने वाला) होने के कारण गिरिराज पर्वत का नाम गोवर्धन पड़ा। यह बात क्षेत्र के खेड़ली गांव में आयोजित भागवत कथा में सुरेंद्र शास्त्री ने शनिवार को कही। उन्होंने कहा कि भगवान अहंकारी स्वभाव को सहन नहीं कर सकते है। इंद्र को अभिमान था कि वह वर्षा करता है। नहीं करूं तो सृष्टि नष्ट हो जाए। अतिवृष्टि कर दूं तो जल प्रलय कर दूं। भगवान कृष्ण ने उनका अभिमान दूर करने के लिए गोवर्धन पूजा कराकर इंद्र का मान-मर्दन किया। कृष्ण की लीलाओं का बखान किया। उन्होंने कहा कि अत्याचारी कंस की सेना से मुकाबले में सक्षम बन सके।
बांसुरी के माध्यम से प्रकृति का संसर्ग संगीत की समधुर ध्वनि से मन को आल्हार मिले। रासलीला काम पर विजय की प्रतीक है। शास्त्री ने कहा कि राधा और कृष्ण एक-दूसरे के रूप है। राधा-कृष्ण की ह्रदय स्वरुपा है और कृष्ण-राधा की ह्रदय स्वरूप में है। राधा-कृष्ण अलग-अलग है, लेकिन स्वरूप में वे एकाकार है। बृजभूमि का कण-कण राधा-कृष्ण की पगरज है। बृजभूमि की यात्रा में वहां प्रकृति की भगवान का गान करते दिखती है।