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यहां महिला पुजारिन और पूजन कार्य भी महिलाओं के हाथ होता है

5 वर्ष पहले
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देशभर में मंदिरों में महिलाओं के जाने को लेकर विवाद गहराया हुआ है। इस बीच जैसलमेर में एक ऐसा मंदिर है जहां पुजारिन भी महिला होती है और यहां पूजा करने महिलाओं काे साथ ले जाना जरूरी होता है। यहां जोड़े से ही पूजा होती है।

यह मंदिर अपने आप में अनूठी मिसाल पेश करता है। जैसलमेर जिले के ग्रामीण शहरी क्षेत्र के सभी लोग इस मंदिर में पूजा करने जाते हैं। अपनी अनूठी संस्कृति और परंपराओं के लिए पहचाने जाने वाले जैसलमेर में खेतपाल मंदिर की अनूठी परंपराएं है जो किसी ओर मंदिर में नहीं है। करीब एक हजार साल पुराना मंदिर जैसलमेर शहर से करीब 6 किलोमीटर दूर बड़ाबाग में स्थित है। जिले के कोने कोने से लोग यहां पूजा करने के लिए आते हैं।

सुहागरात से पहले खेतपाल की पूजा

जैसलमेरके खेतपाल मंदिर में नवविवाहित जोड़े शादी के एक दो दिन के भीतर यहां पूजा अर्चना करने के लिए पहुंचते हैँ। यहां पूजा अर्चना किए बिना सुहागरात नहीं हो सकती है। जो लोग शादी के बाद यहां नहीं सकते हैं वे पूजा के लिए एक नारियल अलग से रख देते हैं, बाद में कभी जाकर पूजा करवाई जाती है।

जैसलमेर में परंपरा है कि शादी होने के पश्चात खेतपाल मंदिर में धोक देना अनिवार्य है। एक अनुमान के मुताबिक आज तक यहां लाखों जोड़े धोक दे चुके हैं। हर जाति के लोग यहां शादी के बाद पूजा अर्चना करने के लिए जाते हैं। यहां के माली समाज की महिलाएं ही इस मंदिर की पुजारिन है और विशेष तौर पर आने वाले दंपती में से महिला के हाथ से पूजा करवाई जाती है।

लाखों जोड़े दे चुके हैं धोक

पुत्र र| की प्राप्ति के लिए इस मंदिर में पूजा

खेेेतपालभवन को पुत्र देने वाला भगवान माना जाता है। शादी के बाद पूजा अर्चना इसी उद्देश्य से ही की जाती है। उसके बाद गर्भवती महिलाएं यहां पूजा करने आती है और कोई पुत्र र| प्राप्त होने के बाद पूजा करने के लिए आते हैं।

खेतपाल को क्षेत्रपाल भैरव भी कहा जाता है। सिंध से आने वाली सात बहनें जो देवियों के रूप में जैसलमेर के कोने कोने में विराजमान है, खेतपाल उनका भाई है। जैसलमेर में सबसे प्राचीन मंदिर बड़ाबाग में है जो करीब एक हजार साल से भी ज्यादा पुराना है।

विवाह बंधन सूत्र खोला जाता है यहां

इसमंदिर में आने की परंपरा यह है कि शादी के बाद पति प|ी के बीच बांधा जाने वाले वाला विवाह बंधन सूत्र जिसे स्थानीय भाषा में कोकण डोरा कहा जाता है, उसे इसी मंदिर में आकर खोला जाता है।

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